भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—हे केशव ! हे धृतकच्छपरूप ! (स्वीकृत-कच्छप -विग्रह) क्षितिः (मेदिनी) धरणि-धरण-किणचक्र-गरिष्ठे (धरण्याः धरणेन बहनेन यत् किणचक्रं कठिनी-भूतत्वक्समूहः) तेन गरिष्ठे सुदृढ़े विपुलतरे (अतिविशाले) तव पृष्ठे तिष्ठति; हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥२॥ अनुवाद—हे केशिनिसूदन ! हे जगदीश ! हे हरे ! आपने कूर्मरूप अङ्गीकार कर अपने विशाल पृष्ठके एक प्रान्तमें पृथ्वीको धारण किया है, जिससे आपकी पीठ व्रणके चिह्नोंसे गौरवान्वित हो रही है। आपकी जय हो॥२॥ पद्यानुवाद— राजित पृष्ठे निज क्षिति विपुला, धरणी धरण-किण अङ्कित बहुला, केशव कच्छप रूप लसे, जय जगदीश हरे॥२॥ बालबोधिनी—अष्टपदीके द्वितीय श्लोकमें श्रीभगवान्के कच्छपावतारका वर्णन किया है। आपने इस पृथ्वी (मन्दराचल) को मात्र आकर्षित ही नहीं किया अपितु अपनी पीठपर धारण करते हुए स्थापन किया है। कच्छपावतार धारण करके श्रीभगवान् पृथ्वीके नीचे विद्यमान हैं और पृथ्वीकी अपेक्षा अत्यधिक विशाल उनके पृष्ठपर यह भूमण्डल एक गेंदकी भाँति अवस्थित है। पृथ्वीके धारण करनेसे उनके पृष्ठपर घाव-चिह्न जाल-सा बन गया है। यह व्रण-चिह्न-जाल आपका अलङ्कार ही है। आपकी जय हो। जय जगदीश हरे! मुखबन्धकी भाँति यह सम्पुट सम्पूर्ण अष्टपदीसे संयोजित है॥२॥ वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना। केशव धृत-शूकररूप जय जगदीश हरे॥३॥