भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद–दामोदरः २१ 'हरे'—इस चतुर्थ सम्बोधनका तात्पर्य यह है कि भगवान् भक्तोंके अशेष प्रकारके कष्टोंको हरण करनेवाले हैं—हरति भक्तानां क्लेशम्। इसी हेतु उनका अवतार होता है। इन चार सम्बोधनोंके द्वारा कविराजने श्रीभगवान्‌के प्रति अतिशय आदर प्रदर्शित किया है। जय, अर्थात् हे प्रभो ! आप अपने उत्कर्षका आविष्कार करनेमें सिद्धहस्त हैं, आप इस उत्कर्षको प्रकट करें। जय जगदीश हरे—यह पंक्ति प्रत्येक पदके साथ आवृत्त करके गायी गई है, अतएव इसे ध्रुव–पद कहा जाता है—'ध्रुवत्वाच्च ध्रुवो ज्ञेयः'। यह ध्रुव–पद अन्तमें प्रयुक्त होता है। इस अष्टपदीमें भगवान् श्रीकेशवके मत्स्यावतारके चरित्रका वर्णन किया गया है। इस प्रथम अवतारमें श्रीकृष्णने प्रलयकालीन महासागरके अगाध जलमें वेदोंको धारण किया तथा स्वयं अपने सींगसे नौकाको ग्रहण करके उसमें सम्पूर्ण प्रकारके बीजों तथा मनु सहित सप्तर्षियोंको प्रलयकाल तक धारण कर बिना प्रयासके ही उनका वहन करते हुए उनकी रक्षा की। इस अवतारमें उन्होंने सत्यव्रत मुनिकी भी रक्षा की थी। अतएव मत्स्यावतारधारी भगवान् केशवकी जय हो। प्रस्तुत पदमें ऊर्ध्वमागधी रीति, उपमा और अतिशयोक्ति अलङ्कार, उत्साह नामक स्थायी-भाव तथा वीररस है। मत्स्यावतारको वीभत्स रसका अधिष्ठाता भी कहा गया है॥ १ ॥ क्षितिरतिविपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे धरणि–धरणकिण–चक्रगरिष्ठे । केशव धृत–कूर्मशरीर जय जगदीश हरे ॥ २ ॥