गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० श्रीगीतगोविन्दम् (१) वराहावतारमें भगवान्के जो बाल गिरे, वे कुश रूपमें अङ्कुरित हुए। वेद-विहित यज्ञादि क्रियाकलापोंमें कुशकी आवश्यकता होती है। बिना कुशके वे कार्यकलाप सम्पन्न नहीं होते। इसलिए भगवान् केशव कहलाये। (२) 'केशाद्वोऽन्यतरस्याम'- इस पाणिनीय सूत्रके अनुसार केश शब्दसे प्रसिद्ध अर्थमें 'व' प्रत्यय होकर केशव शब्द बनता है। (३) श्रीभगवान्के द्वादश व्यूहोंमें 'केशव-व्यूह'का सर्वप्रथम स्थान है। (४) इस 'केशव' नामकी व्याख्या करते हुए भगवद्गुण दर्पणकार कहते हैं- 'प्रशस्तस्निग्धनीलकुटिलकुन्तलः' अर्थात् 'केशव' - यह भगवान्का नाम उन भगवान्के प्रशस्त काले और घुँघराले बालोंवाला बतलाता है। (५) 'केशवः- को ब्रह्मा ईशश्च तावपि वयते प्रशस्तीति' अर्थात् क-ब्रह्मा, ईश-महादेव दोनोंके नियामक या शासकको केशव कहते हैं। (६) 'केशान् वयते' गोपियोंके केश-संस्कार करनेवाले रसिकशेखर श्रीकृष्ण ही 'केशव' कहलाते हैं। (७) केशी नामक दैत्यका संहार करनेवाले केशव हैं। 'धृतमीनशरीर'- यह भगवान्का दूसरा सम्बोधन है। श्रीभगवान् सन्तजनोंके परित्राण और पापियोंके विनाश हेतु विविध रूपोंमें अवतरित होते हैं। उनके असंख्य अवतारोंमेंसे दश प्रधान हैं। उन दश अवतारोंमें मत्स्यावतार सर्वप्रथम अवतार है। इस अवतारमें श्रीभगवान्ने वेदोंके अपहरणकर्त्ता हयग्रीवका वधकर वेदोंका उद्धार किया था। ये मीन अवतार वीभत्स रसके अधिष्ठाता हैं। 'जगदीश'- इस तीसरे सम्बोधनका अभिप्राय यह है कि श्रीभगवान् सम्पूर्ण जगत् और प्रकृतिके ईश्वर हैं। वे सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, स्थिति एवं पालनका नियमन करते हैं तथा जगत्के भीतर अन्तर्यामी रूपमें स्थित होकर उसका नियमन करते हैं। जगदीश शब्दसे भगवान्की करुणा भी प्रकट होती है।