भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः १९ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे हरे ! नौका (जलयान) जैसे बिना किसी खेदके सहर्ष सलिलस्थित किसी वस्तुका उद्धार करती है, वैसे ही आपने बिना किसी परिश्रमके निर्मल चरित्रके समान प्रलय जलधिमें मत्स्यरूपमें अवतीर्ण होकर वेदोंको धारणकर उनका उद्धार किया है। हे मत्स्यावतारधारी श्रीभगवान् ! आपकी जय हो। पद्यानुवाद— जय जगदीश हरे! प्रलय-जलधिसे नौ सम न्यारे वेद उबारे, हास्य-सँवारे। केशव मत्स्य स्वरूप लसे, जय जगदीश हरे ॥१॥ बालबोधिनी—श्रीराधामाधवकी लीलामाधुरीकी सर्वोत्कर्षताका वर्णन करना ही कवि जयदेवको अभिप्रेत है। वे ग्रन्थके आरम्भमें ‘प्रलयपयोधिजले’ श्लोकसे लेकर इस अष्टपदीके अन्ततक समस्त अवतारोंके मूल आश्रय-स्वरूप अखिल नायक शिरोमणि श्रीकृष्णके मत्स्यादि अवतारोंका वर्णन कर रहे हैं। यह अष्टपदी मालव गौड़ रागमें तथा रूपक तालसे गायी जाती है। मालवगौड़ रागका स्वरूप इस प्रकार है— नितम्बिनीचुम्बितवक्त्रपद्मः, शुकद्युतिः कुण्डलवान् प्रमत्तः। सङ्गीतशालां प्रविशन् प्रदोषे, मालाधरो मालवरागराजः ॥ नितम्बिनी नायिकाके द्वारा चुम्बित मुखकमलवाला, शुकके समान हरित-वर्णकी कान्तिवाला, कानोंमें कुण्डल तथा गलेमें माला पहने हुए, मदमत्त, रागोंका राजा मालव सङ्गीतशालामें प्रवेश करता है। इस अष्टपदीका ताल रूपक है। जैसे—अन्तमें विराम और द्रुत दोनोंके मिलनमें विलक्षणा रूपक ताल होता है। इस अष्टपदीमें श्रीभगवान्के लिए चार सम्बोधन हैं। पहला सम्बोधन है 'केशव'। भगवान्को कई कारणोंसे 'केशव' कहा जाता है—