गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २३ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-शूकररूप ! (स्वीकृत-वराह- विग्रह) तव दशनशिखरे (दन्ताग्रे) लग्ना (अवस्थिता) धरणी (पृथिवी, लोकधारणकर्त्रीपि); शशिनि (चन्द्रे) निमग्ना कलङ्ककला (कलङ्करेखा) इव वसति (अवतिष्ठते); हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥३॥ अनुवाद—हे जगदीश ! हे केशव ! हे हरे ! हे वराहरूपधारी ! जिस प्रकार चन्द्रमा अपने भीतर कलङ्कके सहित सम्मिलित रूपसे दिखाई देता है, उसी प्रकार आपके दाँतोंके ऊपर पृथ्वी अवस्थित है ॥३॥ पद्यानुवाद— दशन अग्र धरणी यह लग्ना, शोभित चन्द्र कलङ्क निमग्ना। केशव सूकर-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥३॥ बालबोधिनी—अष्टपदीके तृतीय पदमें भगवान्की स्तुति की गयी है। भगवान् पृथ्वीको धारण करते हैं, इतना ही नहीं, समस्त चराचरको धारण करनेवाली पृथ्वीको अपने दाँतोंपर अवस्थित कर चलते भी हैं। सृष्टिके प्रारम्भमें हिरण्याक्ष जब बीजभूता पृथ्वीका अपहरण करके रसातलमें चला गया था, तो श्रीभगवान्ने वराहरूप धारण किया और प्रलयकालीन जलके भीतर प्रविष्ट होकर अपने दाँतोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाकर ऊपर ले आये तथा अपने सत्यसङ्कल्परूपी योगबलके द्वारा उसे जलके ऊपर स्थापित किया। जिस समय भगवान् अपने दाँतोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाकर ला रहे थे, उस समय उनके उज्ज्वल दाँतोंके ऊपर पृथ्वी ऐसे सुशोभित हो रही थी, जिस प्रकार चन्द्रमाके भीतर उसके बीचमें उसकी कालिमा सुशोभित होती है। कविने भगवान्के दाँतोंको बालचन्द्रमाकी उपमा देकर उनके दाँतोंके महदाकारत्व तथा धरणीके अल्पाकारत्वको सूचित किया है। धरणी कलङ्क कलावत् निमग्ना है। निमग्न
२४ श्रीगीतगोविन्दम् शब्दसे वराहदेव भयानक रसके अधिष्ठाता रूपमें प्रकाशित होते हैं। इस पदमें उपमा अलङ्कार है। हे शूकररूप धारिण ! आपकी जय हो॥३॥ तव करकमलवरे नखमद्भुतशृङ्गम् दलितहिरण्यकशिपु-तनुभृङ्गम्। केशव धृत-नरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-नरहरिरूप ! (नृसिंहरूपधर) तब कर-कमलवरे (पाणिपङ्कज-श्रेष्ठे) अद्भुतशृङ्गं (अद्भुतं शृङ्गम् अग्रं यस्य तादृशं) दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गं (दलिता विदारिता हिरण्यकशिपोः असुरराजस्य या तनुः शरीरं सा एव भृङ्गः येन तथाभूतं) नखं [शोभते इति शेषः], [अतिकोमलेन करकमल-केसरेण सुदृढ़-दैत्यदेहरूपभृङ्गदलनम् अदृष्टचरम्; अतएव अद्भुतम्] हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व) ॥४॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे हरे ! हे केशव ! आपने नृसिंह रूप धारण किया है। आपके श्रेष्ठ करकमलमें नखरूपी अद्भुत शृङ्ग विद्यमान है, जिससे हिरण्यकशिपुके शरीरको आपने ऐसे विदीर्ण कर दिया जैसे भ्रमर पुष्पका विदारण कर देता है, आपकी जय हो ॥४॥ पद्यानुवाद— अम्बुज कर खर नखसे अपने, हिरण्यकशिपुके हर सब सपने। केशव नरहरि-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥४॥ बालबोधिनी—चौथे पद्यमें श्रीजयदेवजीने नृसिंहावतारके रूपमें भगवान्का स्तवन किया है। दुःखकातर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कष्ट स्वीकार कर लेते हैं, पर दूसरोंका दुःख सहन नहीं कर पाते। दितिपुत्र हिरण्यकशिपुने अपने पुत्र
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २५ महाभागवत प्रह्लादपर अत्याचार किया तो भगवान्ने नृसिंह वेशमें उस महादैत्यके वक्षःस्थलको निज नखसे विदीर्णकर उनकी रक्षा की। हे नरहरि रूप धारण करनेवाले केशव ! आपके श्रेष्ठ करकमलमें नख समुदाय एक श्रेष्ठ कमलके अग्रभागके समान हैं, उनमें अति तीक्ष्णता है। यह नख समुदाय अति अद्भुत, पहाड़ की चोटीके समान अति आश्चर्यजनक है। कमलाग्ररूप इन नखोंका यह वैशिष्ट्य है कि अन्य कमलके अग्रभागोंको तो भ्रमर विदीर्ण करते हैं, परन्तु आपके करकमलोंके अग्रभागने तो दैत्यरूपी भ्रमरका ही दलन कर दिया है। विश्वकोषमें शृङ्ग शब्दका अर्थ बजाने वाला विषाण, उत्कर्ष एवं अग्रभाग है। भ्रमरके उदाहरणसे कृष्ण-वर्णत्वको भी सूचित किया गया है। यह रूपक अलङ्कार है। श्रीनृसिंह रूपको वात्सल्यरसका अधिष्ठान माना जाता है॥४॥ छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन पद-नख-नीर-जनितजनपावन। केशव धृत-वामनरूप जय जगदीश हरे ॥५ ॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतवामनरूप ! (वामनरूपधर) हे पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन (पदनख-नीरेण पदनखोद्भूतेन गङ्गाजलेन जनितं जनानां पावनं पवित्रता येन) हे अद्भुतवामन ! (अपूर्ववामनमूर्त्तिधारिन्), विक्रमणे (पादत्रयेन त्रिभुवनाक्रमणेन) बलिं (दानवपतिम् अतिदातृत्वगविणं) छलयसि (प्रतारयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय॥५॥ अनुवाद—हे सम्पूर्ण जगतके स्वामिन् ! हे श्रीहरे ! हे केशव ! आप वामन रूप धारणकर तीन पग धरतीकी याचनाकी क्रियासे बलि राजाकी वञ्चना कर रहे हैं। यह लोक समुदाय आपके पद-नख-स्थित सलिलसे पवित्र हुआ है। हे अद्भुत वामन देव ! आपकी जय हो॥५॥
२६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— छलित नृपति बलि अद्भुत वामन, पदनख नीर हुए जन पावन। केशव वामन-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥५॥ बालबोधिनी—पाँचवे पद्यमें वामनदेवकी स्तुति की गयी है। राजा बलिकी यज्ञशालामें जाकर आपने भिक्षाके छलसे त्रिविक्रमरूप धारणकर ऊपर नीचेके समस्त लोक नाप लिये हैं। छलयसि—इसमें वर्त्तमान कालिक क्रियापदका प्रयोग है, अर्थात् बलिको अपने वरदानसे अनुगृहीतकर उसके साथ पातालमें निवास करते हैं और अनादि कालसे ही अद्भुत वामन बनकर उसे छला करते हैं। पदनख नीर जनित जन पावनसे तात्पर्य है कि उन्होंने अपने पद-नखोंसे श्रीगङ्गाको यहाँ प्रकटकर समस्त संसारको पावन किया है। ब्रह्माजीने पृथ्वी नापते समय भगवान्के चरणोंको ब्रह्मलोकमें देखकर अर्घ्य चढ़ाया। वही जल श्रीगङ्गाजीके रूपमें परिणत हो गया। आपकी जय हो। इस पद्यमें अद्भुत रस है, यहाँपर श्रीभगवान् सख्य रसके अधिष्ठाता रूपमें प्रकाशित हुए हैं॥५॥ क्षत्रिय-रुधिरमये जगदपगत-पापम् स्नपयसि पयसि शमित-भवतापम्। केशव धृत-भृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतभृगुपतिरूप ! (धृतपरशुरामविग्रह)। [हैययवंशीयैरुन्मार्ग-प्रस्थितैः नृपकुलापसदैः समाधावासक्तं पितरं महर्षि जमदग्निं निहतमवगम्य पितृ-वधामर्षजकोपात् गुरुतरपरशुमादाय] क्षत्रियरुधिरमये (क्षत्रशोणितरूपे) पयसि (जले) अपगतपापम् (अपगतानि पापानि यस्य तत्) [अतएव] शमित-भवतापम् (शमितः उपशमतां प्राप्तः भवस्य संसारस्य
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २७ तापः सन्तापो यस्य तादृशं) जगत् स्नपयसि (प्रक्षालयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय॥६॥ अनुवाद—हे जगदीश ! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने भृगु (परशुराम) रूप धारणकर क्षत्रियकुलका विनाश करते हुए उनके रक्तमय सलिलसे जगतको पवित्र कर संसारका सन्ताप दूर किया है। हे भृगुपतिरूपधारिन्, आपकी जय हो॥६॥ पद्यानुवाद— 'वीर-रुधिर' से धो पापोंको, और शमन कर भव-तापोंको। केशव भृगुपति-रूप लसे, जय जगदीश हरे॥६॥ बालबोधिनी—छठवें पद्यमें श्रीपरशुराम अवतारकी स्तुति की है, हे प्रभो ! भृगुपतिरूप धारणकर आपने एकबार नहीं, इकतीस बार ब्राह्मणविद्वेषी क्षत्रियोंका विनाशकर उनके रुधिरसे निर्मित सरोवरको कुरुक्षेत्रका हृद तीर्थ बना दिया है, जिसमें स्नान करनेसे समस्त जगतके प्राणियोंके पापोंका मोचन होता है और संसारके समस्त तापोंसे मुक्ति मिलती है। ज्ञानकी उत्पत्ति होनेसे उत्तापोंकी शान्ति होती है। प्रस्तुत पदमें स्वभाविकोक्ति अलङ्कार तथा अद्भुत रस है। परशुराम अवतारको रौद्र रसका अधिष्ठाता माना जाता है। यहाँतक छह पद्योंके नायकको धीरोद्धत नायक कहा जाता है॥६॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पति-कमनीयं दशमुख-मौलि-बलिं रमणीयम्। केशव धृत-रामशरीर जय जगदीश हरे॥७॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-रघुपतिरूप ! (स्वीकृत-दाशरथि -देह) रणे (युद्धे) दिक्पति-कमनीयं (दिशां पतीनाम् इन्द्रादिलोकपालानां कमनीयं वाञ्छनीयं) [दशसु] दिक्षु रमणीयं
२८ श्रीगीतगोविन्दम् (शोभाकरं) दशमुखमौलिवलिं (रावणदशमुण्डोपहारं) वितरसि (ददासि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥७॥ अनुवाद—हे जगत् स्वामिन् श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने रामरूप धारण कर संग्राममें इन्द्रादि दिक्पालोंको कमनीय और अत्यन्त मनोहर रावणके किरीट भूषित शिरोंकी बलि दशदिशाओंमें वितरित कर रहे हैं। हे रामस्वरूप ! आपकी जय हो ॥७॥ पद्यानुवाद— दिक्पति कान्ति हुई कमनीया, पा रावणकी बलि रमणीया। केशव रघुपति-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥७॥ बालबोधिनी—सातवें पद्यमें श्रीराम-स्वरूपका वर्णन हुआ है। हे प्रभो ! प्रिया वियोगादि दुःखको सहन करनेके लिए आप रघुकुल तिलक श्रीराम रूपमें अवतरित हुए। भयानक संग्राममें संसारको रुलानेवाले रावणके दश मस्तकोंको अनन्तकालके लिए समर्पित कर दिया है अर्थात् रावणके शिरोंको काटकर श्रीभगवान्ने दिक्पालोंको बलि चढ़ाया जिससे कि संसारमें राक्षसोंके द्वारा बढ़े हुए उत्पातोंकी शान्ति हो जाय। दिक्पालोंको रावणकी बलि अत्यन्त अभीष्ट थी। रावणका वध हो जानेसे यह बलि लोकाभिराम बनी। इस बातको जयदेव कविने 'दिक्पति कमनीयम्' एवं 'रमणीयम्' इन दो पदोंके द्वारा अभिव्यक्त किया है। दिक्पालोंकी संख्या दश है तथा रावणके किरीट मण्डित शिरोंकी संख्या भी दश ही है। यही कारण है कि दिक्पालोंको यह बलि अत्यन्त कमनीय थी। दूसरोंको उद्वेग देनेवाले रावणका संहारकर भगवान्ने जगतमें सभीका आनन्दवर्द्धन किया है। इस पदके नायक धीरोदात्त हैं। भगवान्के राम अवतारमें करुण रसका प्रकाश होता है।
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः २९ दशमुख मौलि बलिम्—इस पदकी व्युत्पत्ति दशमुखस्य ये मौलया तान्येव बलिम् अर्थात् रावणके किरीट मण्डित शिर ही बलि हैं। यद्यपि मौलि शब्द शिर और किरीट दोनोंका वाचक है तथापि मौलि मण्डित शिर यह अर्थ तटस्थ लक्षणके द्वारा स्वीकार किया जाता है॥७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् हलहति-भीति-मिलित-यमुनाभम्। केशव धृत-हलधररूप जय जगदीश हरे ॥८॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृतहलधररूप ! (धृतबलदेवशरीर !) त्वं विशदे (शुभ्रे) वपुषि (देहे) जलदाभं (नवघनश्यामं) [अतएव] हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभं (हलस्य लाङ्गलस्य हत्या आघातेन या भीतिः तया मिलिता पादपतिता शरणागता इति यावत् या यमुना तस्या भाः प्रभाइव भा दीप्तिर्यस्य तादृशं) वसनं (वस्त्रं नीलाम्बरमित्यर्थः) वहसि (धारयसि)। हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥८॥ अनुवाद—हे जगत् स्वामिन् ! हे केशिनिसूदन ! हे हरे ! आपने बलदेवस्वरूप धारण कर अति शुभ्र गौरवर्ण होकर नवीन जलदाभ अर्थात् नूतन मेघोंकी शोभाके सदृश नील वस्त्रोंको धारण किया है। ऐसा लगता है, यमुनाजी मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर आपके वस्त्रमें छिपी हुई हैं। हे हलधरस्वरूप ! आपकी जय हो॥८॥ पद्यानुवाद— घन सम वसन विशद तन धारे, यमुन-तरङ्गित हल-भय मारे। केशव हलधर-रूप लसे जय जगदीश हरे ॥८॥ बालबोधिनी—आठवें पदमें भगवान्के हलधारी श्रीबलराम- स्वरूपकी स्तुति की जा रही है। विशद वपु-बलरामजीका वर्ण गौर है, वे शुभ्र हैं।
३० श्रीगीतगोविन्दम् जलदाभ-बलरामजी नील हरित वर्णका वस्त्र धारण करते हैं। जलसे भरे कृष्णवर्णके मेघको जलद कहते हैं। जलदस्य आभा-श्यामा यस्य तम्-यह जलदाभ पदका विग्रह है। जलद कृषकको जिस प्रकार आनन्दित करता है, उसी प्रकार बलरामजीके वस्त्र भक्तोंको आनन्द प्रदान करते हैं। हलहतिभीति मिलित यमुनाभम्-हलेन या हतिः तद् भीत्या मिलिता या यमुना तस्या आभा इव आभा यस्य तत्। भगवान् केवल प्रिया-वियोगादि-दुःख सहन नहीं कर पाते, ऐसा नहीं है। आपने प्रेयसीके श्रमरूप क्लेशको दूर करने हेतु अपनी प्रिय भक्त यमुनाजीको आकर्षित किया है। आपके शुभ्र कान्ति विशिष्ट श्रीअङ्गमें धारण किये हुए नील वसनोंसे ऐसा लगता है मानो आपके हलके प्रहारसे भयभीत होकर यमुनाजी आपके नीले सुरम्य वस्त्रोंमें समा गयी हैं। प्रस्तुत पदके नायक श्रीबलरामजी धीर ललित नायक हैं। इन्हें हास्य रसका अधिष्ठाता माना जाता है ॥८॥ निन्दसि यज्ञ-विधेरहह श्रुतिजातम् सदय-हृदय दर्शितपशुघातम्। केशव धृत-बुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥ अन्वय- हे केशव ! हे सदय-हृदय ! (पशुष्वपि करुणामयचित्त) धृतबुद्धशरीर ! (बुद्धरूपधर ! अहह (खेदे), दर्शित-पशुघातं (दैत्यमोहनाय अहिंसा परमोधर्म इति दर्शितः पशुघातः यस्मिन् तथोक्तं) यज्ञविधेः (क्रतुविधानस्य) श्रुतिजातं (पशुना रुद्रं यजेत इत्यादिकं वेदकामसमूहं) निन्दसि। [वेदान् स्वयमेव प्रकाश्य स्वयमेव तान् निन्दसीत्यद्भुतमित्यर्थः] हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥९॥ अनुवाद-हे जगदीश्वर ! हे हरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने बुद्ध शरीर धारण कर सदय और सहृदय होकर यज्ञ विधानों
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३१ द्वारा पशुओंकी हिंसा देखकर श्रुति समुदायकी निन्दा की है। आपकी जय हो ॥९॥ पद्यानुवाद— निन्दे यज्ञ नियम श्रुति-मगके, माने मानव सम पशु जगके। केशव बुद्ध-शरीर लसे, जय जगदीश हरे ॥९॥ बालबोधिनी—नवें पदमें भगवान्के बुद्धावतारकी स्तुति की जा रही है। वेद श्रीभगवान्के श्वासस्वरूप हैं; 'तस्य निःश्वसितं वेदाः'। वेदोंको स्वयं भगवान्की आज्ञास्वरूप माना जाता है। वेद शास्त्रोंमें जब विरोधी मत अर्थात् वेदोंके विरुद्ध विचार धाराएँ बढ़ने लगीं, तब आपने बुद्धावतार ग्रहण किया। यह प्रश्न होता है कि स्वयं यज्ञ विधिको बनाकर फिर यज्ञ विधायिका श्रुतियोंकी क्यों निन्दा की? अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि स्वयं ही वेदोंके प्रकाशक हैं और स्वयं ही वेदोंकी भर्त्सना कर रहे हैं। इसके उत्तरमें 'सदय हृदय दर्शित पशुघातम्' अर्थात् आपने पशुओंके प्रति दयावान् होकर अहिंसा परमो धर्मः, यह उपदेश प्रदानकर दैत्योंको मोहित किया है। आपने जैसे अमृतकी रक्षा करनेके लिए दैत्योंको मोहित किया था, उसी प्रकार प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिए आपने दैत्योंको मोहितकर यज्ञोंको अनुचित बतलाया है। यज्ञमें की जानेवाली पशुओंकी हिंसाको देखकर श्रीभगवान्के हृदयमें दया प्रसूत हुई और दया विवश होकर अपने इस अवतारमें यज्ञ प्रतिपादक वेद शास्त्रोंकी निन्दा की। इस पदके नायक धीर शान्त हैं। भगवान् बुद्धको शान्त रसका अधिष्ठाता माना गया है॥९॥ म्लेच्छ-निवहनिधने कलयसि करवालं धूमकेतुमिव किमपि करालम्। केशव धृत-कल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥
३२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—हे केशव ! हे धृत-कल्किशरीर ! [त्वं] म्लेच्छ- निवहनिधने (वेद-बाह्यान् उन्मार्गप्रस्थितान् दुराचारान् हत्वा पुनर्वर्णाश्रम-स्थापनायेत्यर्थः) धूमकेतुमिव किमपि (अनिर्वचनीयम् अतिशयमित्यर्थः) करालं (भीषणं) करवालं (असिं) कलयसि (धारयसि); हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥१०॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने कल्किरूप धारणकर म्लेच्छोंका विनाश करते हुए धूमकेतुके समान भयङ्कर कृपाणको धारण किया है। आपकी जय हो ॥१०॥ पद्यानुवाद— म्लेच्छ-नाश-असि धरे विशाला, धूमकेतु-सम बने कराला। केशव कल्कि-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥१०॥ बालबोधिनी—दशवें पदमें भगवान्के कल्कि अवतारकी प्रशंसा की जा रही है। बिना युद्ध किये प्राणियोंका संहार नहीं होगा, बिना संहार किये शान्ति भी नहीं आयेगी। इसलिए आप कल्कि रूप धारणकर म्लेच्छोंका विनाश करते हैं। दुष्ट मनुष्योंका संहार करनेके लिए भगवान् भयङ्कर काल कराल रूप तलवारको धारण करते हैं। 'किमपि' पदसे कवि द्वारा कृपाणकी भयङ्कर स्वरूपता दिखाई है। धूमकेतुमिव—धूमकेतु एक ताराविशेषका नाम है। जिसके उदित होनेपर महान उपद्रवकी शङ्का की जाती है। भगवान्का कृपाणरूपी धूमकेतु म्लेच्छोंके अमङ्गलका सूचक है। धूमकेतु शब्द अग्निका भी वाचक है, जिससे म्लेच्छ समुदायका अनिष्ट सूचित होता है। प्रस्तुत पदके नायक धीरोद्धत हैं। कल्कि भगवान्को वीर रसका अधिष्ठाता माना जाता है॥१०॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् शृणु सुखदं शुभदं भवसारम्। केशव धृत-दशविधरूप जय जगदीश हरे ॥११ ॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-दशविधरूप ! (स्वीकृतदशावतार- विग्रह) हे जगदीश, हे हरे, [त्वं] जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व); [तथा] उदारं (महार्थयुक्तं) सुखदं (ऐहिकामुष्मिकपरमानन्दप्रदं) शुभदं (कल्याणप्रदं) भवसारं (भवे संसारे सारं सर्वोत्कृष्टं; यद् वा अवताराणां जन्मनः सारम् आविर्भाव-रहस्यं यत्र तत्) श्रीजयदेवकवेः उदितम् (भाषितं) इदं (दशावतारस्तोत्रं) शृणु, [अथवा अयि महानुभाव भक्तजन इति अध्याहार्यम्] ॥११ ॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! हे दशबिध रूपोंको धारण करनेवाले भगवन् ! आप मुझ जयदेव कविकी औदार्यमयी, संसारके सारस्वरूप, सुखप्रद एवं कल्याणप्रद स्तुतिको सुनें ॥११ ॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव कथित हरि-लीला, सुनो सुखद यह शुभ गतिशीला। केशव दशविध-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥११ ॥ बालबोधिनी—इस प्रकार दशावतार स्तुतिके अन्तमें महाकवि जयदेव प्रत्येक रसके अधिष्ठान स्वरूप एक-एक अवतारका जयगान कर अब समस्त रसोंके अधिनायक श्रीकृष्णसे निवेदन करते हैं कि हे दशविध स्वरूप ! आपकी जय हो। सुखद—सद्यः परनिवृत्तिकारक होनेके कारण यह स्तुतिकाव्य श्रवणकालमें ही परमानन्द प्रदान करनेवाला है। यह स्तोत्र जगन्मङ्गलकारी है जो कि आपके आविर्भावके रहस्योंको अभिव्यक्त करनेवाला है।
३४ श्रीगीतगोविन्दम् शुभदं—शुभदायी होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके समस्त प्रतिबन्धकोंका विनाश करनेवाला है। भवसारम्—संसाररूपी सागरको पार करनेके जितने भी साधन हैं, उन सबमें प्रधान है। भवच्छेदक हेतु मध्ये सारम्—यह मध्यमपदलोपी समास ‘भवसारम्’ पदमें जानना चाहिए। जय—वर्त्तमानकालिक क्रियापदके द्वारा यह सूचित होता है कि भगवान्के समस्त अवतार नित्य एवं उनकी लीलाएँ भी नित्य हैं। कविने यह भी प्रमाणित कर दिया है कि श्रीकृष्ण सभी अवतारोंके मूल कारण हैं। उन्हींसे सभी अवतारोंका प्राकट्य हुआ है, वे सभी रूपोंमें सत्य हैं, अतएव पूर्णावतारी, नित्य लीलाविलासी, दशावतार स्वरूप, सर्वाकर्षक एवं आनन्द प्रदाता आपकी नित्य ही जय जयकार हो। उदात्त तथा सरल भाषामें मैंने आपकी स्तुति की है। आप इसका श्रवण करें। आपका भक्त कवि जयदेव आपको यह स्तुति निवेदन कर रहा है। प्रस्तुत श्लोकमें शान्त रस तथा पर्यायोक्ति अलङ्कार है॥११॥ वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्विभ्रते दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते। पौलस्तं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥१२॥ इति श्रीगीतगोविन्दे प्रथमः सन्दर्भः। अन्वय—अधुना सर्वेषामेव दशावताराणां पूर्णपुरुषे श्रीकृष्णे परिणतिं भङ्गिक्रमेणाह।—[प्रलयपयोधिमग्नान्] वेदान् उद्धरते [मीनरूपाय तुभ्यं],—जगन्ति वहते (पृष्ठदेशेन उद्धरते) [कूर्मरूपाय तुभ्यं]—भूगोलम् (भूमण्डलम्) उद्विभ्रते (दशनेन ऊर्ध्वं तोलयते) [वराहरूपाय तुभ्यं],—दैत्यं (हिरण्यकशिपुं) दारयते (नखैः विदारयते)
[नृसिंहरूपाय तुभ्यं],—बलिं (दैत्येश्वरं) छलयते (वञ्चयते) [वामनरूपाय तुभ्यं],—क्षत्रक्षयं (क्षत्रियध्वंसं) कुर्वते [जामदग्न्यरूपाय तुभ्यं],—पौलस्त्यं (रावणं) जयते [रामरूपाय तुभ्यं],—[दुष्टदमनाय] हलं (लाङ्गलं) कलयते (धारयते) [बलभद्ररूपाय तुभ्यं],—म्लेच्छान् [अनार्याचारान्] मूर्च्छयते (नाशयते) [कल्किरूपाय तुभ्यं]—[अतएव] दशाकृतिकृते (दशावतार रूपधराय) कृष्णाय (स्वयं भगवते वासुदेवाय) तुभ्यं नमः [एतेषामवतारित्वेन श्रीकृष्णस्य सर्वरसत्वं सिद्धम्। “बुद्धो नारायणोपेन्द्रौ नृसिंहो नन्दनन्दनः। बलः कूर्मस्तथा कल्की राघवो भार्गवः किरिः। मीन इत्येताः कथिताः क्रमाद्द्वादशः देवताः॥” इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसाधिष्ठातारः॥] ॥१२॥ अनुवाद—वेदोंका उद्धार करनेवाले, चराचर जगत्को धारण करनेवाले, भूमण्डलका उद्धार करनेवाले, हिरण्यकशिपुको विदीर्ण करनेवाले, बलिको छलनेवाले, क्षत्रियोंका क्षय करनेवाले, पौलस्त (रावण) पर विजय प्राप्त करनेवाले, हल नामक आयुधको धारण करनेवाले, करुणाका विस्तार करनेवाले, म्लेच्छोंका संहार करनेवाले—इस दश प्रकारके शरीर धारण करनेवाले हे श्रीकृष्ण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥१२॥ बालबोधिनी—इस गीतगोविन्द काव्यके प्रथम सर्गके प्रथम प्रबन्धके दश पद्योंमें कवि जयदेवजीने भगवान् श्रीकृष्णके अवतारोंकी मनोरम लीलाओंका चित्रण किया है। दश अवतार स्वरूपको प्रकट करनेवाले श्रीकृष्णने मत्स्य रूपमें वेदोंका उद्धार किया, कूर्म रूपमें पृथ्वीको धारण किया, वराह रूपमें पृथ्वीका उद्धार किया, नृसिंह रूपमें हिरण्यकशिपुको विदीर्ण किया, वामन रूपमें बलिको छलकर उसे अपना लिया, परशुराम रूपमें दुष्ट क्षत्रियोंका विनाश किया, बलभद्र रूपमें दुष्टोंका दमन किया, बुद्धके रूपमें करुणाका विस्तार किया, कल्कि रूपमें म्लेच्छोंका नाश
३६ श्रीगीतगोविन्दम् किया—इस प्रकार दशविध अवतार धारण करनेवाले हे भगवान् श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है॥१२॥ इति दशावतार कीर्त्तिधवलो नाम प्रथमः प्रबन्धः। इस प्रकार प्रथम प्रबन्धमें दशावतार स्तोत्र कीर्त्तिधवल नामक छन्द है। प्रस्तुत प्रबन्धमें पारस्वर, मध्यमादि राग, आदि ताल, विलम्बित लय, माध्यमी रीति तथा शृङ्गार रस है। इसमें वासुदेव भगवान्के यशका वर्णन है॥ इति श्रीगीतगोविन्दे प्रथमः सन्दर्भः। अथ द्वितीय सन्दर्भः। गीतम् ॥२॥ गुर्ज्जरी राग निःसार तालाभ्यां गीयते अनुवाद—गुर्ज्जरी राग तथा निःसार तालसे यह द्वितीय प्रबन्ध गाया जाता है। गुर्ज्जरी राग—श्यामा नायिकाके समान जो शीतकालमें उष्ण और ग्रीष्मकालमें सुशीतल होती है, जिसके स्तनयुगल सम्यक् रूपेण कठोर हैं, जिसके पदस्पर्श मात्रसे अशोक वृक्षमें असमय ही पुष्प प्रस्फुटित हो जाते हैं, जो मनोहर केशोंको धारण करनेवाली, मलय तरुवरकी कोमल पल्लवोंद्वारा सुसज्जित शय्यामें पहुँचती हैं, श्रुतिके दाहिनी ओरसे स्वरोंको धारण करती है। इसमें निःसार ताल जैसे दो ताल द्रुत और दो ताल लघु होते हैं। इसको गुर्ज्जरी राग कहा जाता है। श्रितकमलाकुच मण्डल! धृत-कुण्डल! कलित-ललित-वनमाल! जय जय देव हरे ॥१॥ध्रुवम्॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३७ दिनमणि-मण्डल-मण्डन! भवखण्डन! मुनिजन-मानस-हंस! जय जय देव हरे ॥२॥ कालिय-विषधर-गञ्जन! जनरञ्जन! यदुकुल-नलिन-दिनेश! जय जय देव हरे ॥३॥ मधु-मुर-नरक-विनाशन! गरुडासन! सुरकुल-केलि-निदान! जय जय देव हरे ॥४॥ अमल-कमल-दललोचन! भव मोचन। त्रिभुवन भवन-निधान! जय जय देव हरे ॥५॥ जनक-सुता-कृत-भूषण! जितदूषण! समर-शमित-दशकण्ठ! जय जय देव हरे ॥६॥ अभिनव-जलधर-सुन्दर! धृतमन्दर! श्रीमुखचन्द्र-चकोर! जय जय देव हरे ॥७॥ तव चरणे प्रणता वयम् इति भावय। कुरु कुशलं प्रणतेषु, जय जय देव हरे ॥८॥ श्रीजयदेवकवेरिदं कुरुते मुदम्। मङ्गलमुज्ज्वलगीतम् जय जय देव हरे ॥९॥ —★—
३८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रितकमलाकुचमण्डल ! धृत कुण्डल ! कलित-ललित-वनमाल ! जय जय देव हरे ॥१॥ ध्रुवम् ॥ अन्वय-[इदानीं परव्योमनाथत्वेन धीरललितत्वमाह-हे श्रितकमलाकुचमण्डल (श्रितं धृतं कमलाया लक्ष्म्याः कुचमण्डलं स्तनयुगलं येन तत्सम्बुद्धौ) अनेन विदग्धत्वपरिहासविशारदत्व- प्रेयसीवशतत्वनिश्चिन्तत्वानि सुचितानि] हे धृतकुण्डल (धृते कुण्डले तत्सम्बुद्धौ) हे कलितललितवनमाल (कलिता धृता ललिता सुन्दरी वनमाला येन तत्सम्बुद्धौ); [एतेन विशेषणद्वयेन नवतारुण्यत्वं सूचितम्, तेनैव वेशविन्याससिद्धेः] हे देव, हरे, जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“विदग्धो नव-तारुण्यः परिहास- विशारदः। निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥”] ॥१॥ अनुवाद-हे श्रीराधाजीके स्तन मण्डलका आश्रय लेनेवाले ! कानोंमें कुण्डल तथा अतिशय मनोहर वनमाला धारण करनेवाले हे हरे ! आपकी जय हो ॥ अथवा हे देव ! हे हरे ! हे कमला कुचमण्डल बिहारी ! हे कुण्डल भूषण धारि ! हे ललित मालाधर ! आपकी जय हो ॥१॥ पद्यानुवाद- धृत कमला कुच मण्डल श्रुतिकुण्डल हे। कलित ललित वनमाल जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी-कवि श्रीजयदेवजी श्रीकृष्णको सबके उपास्य रूपमें वर्णितकर अब दूसरे गीति-प्रबन्धमें एकमात्र चिन्तनीय स्वरूप ध्येयरूपमें वर्णन हेतु धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरशान्त और धीरललित आदि नायकत्व गुणोंसे समन्वित समस्त नायक-चूड़ामणि श्रीकृष्णकी सर्वश्रेष्ठताको प्रकटित करते हुए प्रार्थना करते हैं। श्रित कमला कुचमण्डल हे-इस पदका विग्रह है-श्रित कमलायाः कुचमण्डलं येनाऽसौ तत्सम्बुद्धौ श्रितकमलाकुचमण्डल
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३९ अर्थात् श्रीकृष्ण श्रीराधाजीके स्तनमण्डलीकी सेवा करनेवाले हैं। वे लक्ष्मीजीके प्रिय हैं तथा श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रियतमा हैं। इस पदसे यह भी सूचित होता है कि वे श्रीकृष्ण क्रीड़ाविलासी, विदग्ध, परिहास विशारद, प्रेयसीवश एवं निश्चिन्त हैं। 'ए'कार आलाप मात्र है। धृतकुण्डल ए, धृते कुण्डल येन स तथा तस्य सम्बुद्धिः, अर्थात् जिन्होंने कानोंमें कुण्डल धारण किया है, मकराकृति कुण्डल धारण करनेसे उनके मुखारविन्दकी शोभा और भी बढ़ जाती है। कलित ललित वनमाल—आपने अतिशय मनोहर वनमालाको धारण किया है। विश्वकोषकार कहते हैं— आपादलम्बिनी माला वनमालेति तां विदुः। पत्रपुष्पमयी माला वनमाला प्रकीर्त्तिता॥ अर्थात् पैरपर्यन्त लटकनेवाली मालाको वनमाला कहते हैं। वनमाला पत्र एवं पुष्पोंसे बनी हुई होती है। इस प्रकार तीनों विशेषणोंसे श्रीकृष्णका नवतारुण्य द्योतित होता है, उनका वेशविन्यास भी प्रकाशित होता है—नवकिशोर नटवर गोपवेश वेणुकर। हरे—हे श्रीकृष्ण ! आप सबके चित्त, मन एवं प्राणोंको आकर्षित करते हैं, साथ ही सबके मध्यमें अपनी लीला चमत्कारिता प्रकट करते हैं। इससे आपका उत्कर्ष उजागर हो रहा है। इस गीतिके प्रत्येक पदके अन्तमें 'जय जय देव हरे'—इस ध्रुव पदकी संयोजना है। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीकृष्णका धीरललितत्व चित्रित हो रहा है, जैसाकि धीरललित नायकका लक्षण है—विदग्ध, नवतरुण, विशारद, निश्चिन्त एवं प्रेयसीवश्यता। 'ए'-कार का प्रयोग गानकी वेलामें रागपूर्त्तिके लिए हुआ है॥१॥
४० श्रीगीतगोविन्दम् दिनमणि-मण्डल-मण्डन! भवखण्डन! मुनिजन-मानस-हंस! जय जय देव हरे॥२॥ अन्वय—[अथ सवितृमण्डलान्तर्ध्येयत्वेन धीरशान्तत्वमाह]—हे दिनमणिमण्डलमण्डन (हे सवितृमण्डलभूषण) [अनेन क्लेशसहत्वं विनयादिगुणोपेतत्वञ्च सूचितम्]; [अतएव] हे मुनिजनमानस-हंस (मुनिजनानां मानसं चित्तं तदाख्यः सरइव तत्र स्थित हंस) [हंसो जलचरजीवविशेषः तदाख्यपरममन्त्रस्वरूपश्च]; [अनेन समप्रकृतिकत्वं विनयादिगुणोपेतत्वञ्च सूचितम्]; हे भवखण्डन (भवं संसारं खण्डयतीति तत्सम्बुद्धौ, संसारबन्धखण्डनकृत्), हे देव, हरे, जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“सम प्रकृतिकक्लेश- सहनश्च विवेचकः। विनयादिगुणोपेतो धीरशान्त उदीर्यते”] ॥२॥ अनुवाद—हे देव! हे हरे! हे सूर्य-मण्डलको विभूषित करनेवाले, भव-बन्धनका छेदन करनेवाले! मुनिजनोंके मानस सरोवरमें विहार करनेवाले हंस! आपकी जय हो! जय हो॥२॥ पद्यानुवाद— दिनमणि मण्डित भव खण्डित हे। मुनिजन मानस हंस जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—दिनमणि मण्डल मण्डन! श्रीभगवान्का सूर्यमण्डलके भीतर अन्तर्यामी रूपमें निवास है। वे ध्येय एवं चिन्तनीय हैं। ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती, नारायणः सरसिजासन सन्निविष्टः। जैसे सूर्यमण्डल सभीके द्वारा पूज्य हैं, उसी प्रकार आप भी सबके द्वारा चिन्तनीय एवं उपास्य हैं। और भी कहा है—ज्योतिरुभ्यन्तरे श्यामसुन्दरमतुलं॥ भवखण्डन ए—एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः।
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४१ अर्थात् यह आत्मा स्वभावसे कर्मके बन्धनसे रहित, जरा, मृत्यु, शोक, मोह, भूख, प्याससे रहित सत्यकाम तथा सत्यसङ्कल्प है। संसार बन्धनमें पड़े रहनेसे ये गुण तिरोहित हो जाते हैं और भगवान्की कृपा होनेपर आविर्भूत हो जाते हैं। इसलिए 'भवखण्डन' कहकर भगवान् श्रीकृष्णको सम्बोधित किया है। मुनिजनमानसहंस—मुनिजनानां मानसानि इव मानसानि तेषु हंस इव हंस-अर्थात् मननशील मुनियोंके मानसरूप मानसरोवरमें श्रीभगवान् उसी प्रकार विहार करते हैं, जैसे राजहंस मानसरोवरमें। आपके विहार करनेसे इन मुनियोंमें सदा स्फूर्ति होती रहती है। ये मुनिगण सम प्रकृति होकर कष्ट सहन करते हैं और विनय आदि गुणोंसे सम्पन्न होकर भजन करते हैं। भगवान्की कृपा होनेसे ये संसारसे विरक्त हो जाते हैं। देव-दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण भगवान्को 'देव' शब्दसे अभिहित किया है। जय-इस क्रियापदका प्रयोग कविकी आदरातिशयताका द्योतक है। प्रस्तुत पदके नायक धीरशान्त हैं ॥२॥ कालिय-विषधर-गञ्जन जनरञ्जन ! यदुकुल-नलिन-दिनेश ! जय जय देव हरे ॥३॥ अन्वय-[ध्येयविशेषत्वेन धीरोद्धतत्वमाह द्वाभ्याम्]—हे कालियविषधरगञ्जन (कालियसर्पदमन) हे जनरञ्जन (जनसन्तोष) हे यदुकुल-नलिन-दिनेश (यदुकुलान्येव नलिनानि तेषां दिनेशः सूर्यइव तत्सम्बुद्धौ) हे देव, हरे जय जय [“मात्सर्यवानहङ्कारी मायावी रोषणश्चलः। विकत्थनश्च विद्वद्भिर्धीरोद्धत उदाहृत।” अत्र कालियेत्यादिना मात्सर्यवत्त्वं जनरञ्जनेत्यादिना यदुकुलेत्यादिना च अहङ्कारित्वम् अहन्तया ममच जनरञ्जनादिसिद्धेः] ॥३॥
४२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे देव! हे हरे! विषधर कालिय नामके नागका मद चूर्ण करनेवाले, निजजनोंको आह्लादित करनेवाले, हे यदुकुलरूप कमलके प्रभाकर! आपकी जय हो! जय हो॥३॥ पद्यानुवाद— कालिय विषधर गञ्जन जन रञ्जन हे। यदुकुल नलिन दिनेश जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—कवि श्रीकृष्णको अपना उपास्य होनेपर भी ध्येय विषयके रूपमें स्तुति कर रहे हैं। इसमें श्रीकृष्णका धीरोद्धत नायकत्व प्रस्तुत किया जा रहा है। कालिय विषधर गञ्जन—श्रीकृष्ण भगवान्ने यमुनामें रहनेवाले (कालिय दहमें) कालिय नामक सौ फणवाले महा विषधर सर्पका गर्व खर्व (चूर्ण) कर दिया। जन-रञ्जन ए—भगवान्ने कालिय दमनसे व्रजजनोंको आह्लादित किया। श्रीकृष्ण भलीभाँति जानते हैं कि व्रजजन उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते, यहाँतक कि वे मेरे बिना प्राण भी धारण नहीं कर सकते, उनकी रक्षा, उनका अनुरञ्जन श्रीकृष्णको भी करणीय हो जाता है। हे जन अनुरञ्जन कारिन्! आपकी जय हो!! यदुकुल-नलिन-दिनेश—गोपगण ही यादव हैं। अतएव भगवान् ही गोकुलके प्रकाशक हैं। जिस प्रकार भास्करके उदित हो जानेपर अरविन्द प्रफुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्के द्वारा यदुवंशमें अवतार ग्रहण करनेसे यदुवंश विकसित हुआ है। प्रस्तुत पदमें श्रीभगवान्को बलशाली, जन-आह्लादकारी गुणसम्पन्न एवं कुलीन बताया है। अतः हे देव! आप हम जैसे मात्सर्य भावयुक्त अहङ्कारियोंका अहङ्कार चूर्णकर हमारा अनुरञ्जन करें। धीरोद्धत—मात्सर्यवान्, अहङ्कारी, मायावी, रोष-परायण, चञ्चल, विकथनकारी नायकको धीरोद्धत नायक कहा जाता है॥३॥