भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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[नृसिंहरूपाय तुभ्यं],—बलिं (दैत्येश्वरं) छलयते (वञ्चयते) [वामनरूपाय तुभ्यं],—क्षत्रक्षयं (क्षत्रियध्वंसं) कुर्वते [जामदग्न्यरूपाय तुभ्यं],—पौलस्त्यं (रावणं) जयते [रामरूपाय तुभ्यं],—[दुष्टदमनाय] हलं (लाङ्गलं) कलयते (धारयते) [बलभद्ररूपाय तुभ्यं],—म्लेच्छान् [अनार्याचारान्] मूर्च्छयते (नाशयते) [कल्किरूपाय तुभ्यं]—[अतएव] दशाकृतिकृते (दशावतार रूपधराय) कृष्णाय (स्वयं भगवते वासुदेवाय) तुभ्यं नमः [एतेषामवतारित्वेन श्रीकृष्णस्य सर्वरसत्वं सिद्धम्। “बुद्धो नारायणोपेन्द्रौ नृसिंहो नन्दनन्दनः। बलः कूर्मस्तथा कल्की राघवो भार्गवः किरिः। मीन इत्येताः कथिताः क्रमाद्द्वादशः देवताः॥” इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसाधिष्ठातारः॥] ॥१२॥ अनुवाद—वेदोंका उद्धार करनेवाले, चराचर जगत्को धारण करनेवाले, भूमण्डलका उद्धार करनेवाले, हिरण्यकशिपुको विदीर्ण करनेवाले, बलिको छलनेवाले, क्षत्रियोंका क्षय करनेवाले, पौलस्त (रावण) पर विजय प्राप्त करनेवाले, हल नामक आयुधको धारण करनेवाले, करुणाका विस्तार करनेवाले, म्लेच्छोंका संहार करनेवाले—इस दश प्रकारके शरीर धारण करनेवाले हे श्रीकृष्ण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥१२॥ बालबोधिनी—इस गीतगोविन्द काव्यके प्रथम सर्गके प्रथम प्रबन्धके दश पद्योंमें कवि जयदेवजीने भगवान् श्रीकृष्णके अवतारोंकी मनोरम लीलाओंका चित्रण किया है। दश अवतार स्वरूपको प्रकट करनेवाले श्रीकृष्णने मत्स्य रूपमें वेदोंका उद्धार किया, कूर्म रूपमें पृथ्वीको धारण किया, वराह रूपमें पृथ्वीका उद्धार किया, नृसिंह रूपमें हिरण्यकशिपुको विदीर्ण किया, वामन रूपमें बलिको छलकर उसे अपना लिया, परशुराम रूपमें दुष्ट क्षत्रियोंका विनाश किया, बलभद्र रूपमें दुष्टोंका दमन किया, बुद्धके रूपमें करुणाका विस्तार किया, कल्कि रूपमें म्लेच्छोंका नाश