गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ श्रीगीतगोविन्दम् शुभदं—शुभदायी होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके समस्त प्रतिबन्धकोंका विनाश करनेवाला है। भवसारम्—संसाररूपी सागरको पार करनेके जितने भी साधन हैं, उन सबमें प्रधान है। भवच्छेदक हेतु मध्ये सारम्—यह मध्यमपदलोपी समास ‘भवसारम्’ पदमें जानना चाहिए। जय—वर्त्तमानकालिक क्रियापदके द्वारा यह सूचित होता है कि भगवान्के समस्त अवतार नित्य एवं उनकी लीलाएँ भी नित्य हैं। कविने यह भी प्रमाणित कर दिया है कि श्रीकृष्ण सभी अवतारोंके मूल कारण हैं। उन्हींसे सभी अवतारोंका प्राकट्य हुआ है, वे सभी रूपोंमें सत्य हैं, अतएव पूर्णावतारी, नित्य लीलाविलासी, दशावतार स्वरूप, सर्वाकर्षक एवं आनन्द प्रदाता आपकी नित्य ही जय जयकार हो। उदात्त तथा सरल भाषामें मैंने आपकी स्तुति की है। आप इसका श्रवण करें। आपका भक्त कवि जयदेव आपको यह स्तुति निवेदन कर रहा है। प्रस्तुत श्लोकमें शान्त रस तथा पर्यायोक्ति अलङ्कार है॥११॥ वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्विभ्रते दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते। पौलस्तं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥१२॥ इति श्रीगीतगोविन्दे प्रथमः सन्दर्भः। अन्वय—अधुना सर्वेषामेव दशावताराणां पूर्णपुरुषे श्रीकृष्णे परिणतिं भङ्गिक्रमेणाह।—[प्रलयपयोधिमग्नान्] वेदान् उद्धरते [मीनरूपाय तुभ्यं],—जगन्ति वहते (पृष्ठदेशेन उद्धरते) [कूर्मरूपाय तुभ्यं]—भूगोलम् (भूमण्डलम्) उद्विभ्रते (दशनेन ऊर्ध्वं तोलयते) [वराहरूपाय तुभ्यं],—दैत्यं (हिरण्यकशिपुं) दारयते (नखैः विदारयते)