भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३३ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् शृणु सुखदं शुभदं भवसारम्। केशव धृत-दशविधरूप जय जगदीश हरे ॥११ ॥ अन्वय—हे केशव ! हे धृत-दशविधरूप ! (स्वीकृतदशावतार- विग्रह) हे जगदीश, हे हरे, [त्वं] जय (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तस्व); [तथा] उदारं (महार्थयुक्तं) सुखदं (ऐहिकामुष्मिकपरमानन्दप्रदं) शुभदं (कल्याणप्रदं) भवसारं (भवे संसारे सारं सर्वोत्कृष्टं; यद् वा अवताराणां जन्मनः सारम् आविर्भाव-रहस्यं यत्र तत्) श्रीजयदेवकवेः उदितम् (भाषितं) इदं (दशावतारस्तोत्रं) शृणु, [अथवा अयि महानुभाव भक्तजन इति अध्याहार्यम्] ॥११ ॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर ! हे श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! हे दशबिध रूपोंको धारण करनेवाले भगवन् ! आप मुझ जयदेव कविकी औदार्यमयी, संसारके सारस्वरूप, सुखप्रद एवं कल्याणप्रद स्तुतिको सुनें ॥११ ॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव कथित हरि-लीला, सुनो सुखद यह शुभ गतिशीला। केशव दशविध-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥११ ॥ बालबोधिनी—इस प्रकार दशावतार स्तुतिके अन्तमें महाकवि जयदेव प्रत्येक रसके अधिष्ठान स्वरूप एक-एक अवतारका जयगान कर अब समस्त रसोंके अधिनायक श्रीकृष्णसे निवेदन करते हैं कि हे दशविध स्वरूप ! आपकी जय हो। सुखद—सद्यः परनिवृत्तिकारक होनेके कारण यह स्तुतिकाव्य श्रवणकालमें ही परमानन्द प्रदान करनेवाला है। यह स्तोत्र जगन्मङ्गलकारी है जो कि आपके आविर्भावके रहस्योंको अभिव्यक्त करनेवाला है।

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