गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—हे केशव ! हे धृत-कल्किशरीर ! [त्वं] म्लेच्छ- निवहनिधने (वेद-बाह्यान् उन्मार्गप्रस्थितान् दुराचारान् हत्वा पुनर्वर्णाश्रम-स्थापनायेत्यर्थः) धूमकेतुमिव किमपि (अनिर्वचनीयम् अतिशयमित्यर्थः) करालं (भीषणं) करवालं (असिं) कलयसि (धारयसि); हे जगदीश, हे हरे, त्वं जय ॥१०॥ अनुवाद—हे जगदीश्वर श्रीहरे ! हे केशिनिसूदन ! आपने कल्किरूप धारणकर म्लेच्छोंका विनाश करते हुए धूमकेतुके समान भयङ्कर कृपाणको धारण किया है। आपकी जय हो ॥१०॥ पद्यानुवाद— म्लेच्छ-नाश-असि धरे विशाला, धूमकेतु-सम बने कराला। केशव कल्कि-रूप लसे, जय जगदीश हरे ॥१०॥ बालबोधिनी—दशवें पदमें भगवान्के कल्कि अवतारकी प्रशंसा की जा रही है। बिना युद्ध किये प्राणियोंका संहार नहीं होगा, बिना संहार किये शान्ति भी नहीं आयेगी। इसलिए आप कल्कि रूप धारणकर म्लेच्छोंका विनाश करते हैं। दुष्ट मनुष्योंका संहार करनेके लिए भगवान् भयङ्कर काल कराल रूप तलवारको धारण करते हैं। 'किमपि' पदसे कवि द्वारा कृपाणकी भयङ्कर स्वरूपता दिखाई है। धूमकेतुमिव—धूमकेतु एक ताराविशेषका नाम है। जिसके उदित होनेपर महान उपद्रवकी शङ्का की जाती है। भगवान्का कृपाणरूपी धूमकेतु म्लेच्छोंके अमङ्गलका सूचक है। धूमकेतु शब्द अग्निका भी वाचक है, जिससे म्लेच्छ समुदायका अनिष्ट सूचित होता है। प्रस्तुत पदके नायक धीरोद्धत हैं। कल्कि भगवान्को वीर रसका अधिष्ठाता माना जाता है॥१०॥