गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ श्रीगीतगोविन्दम् किया—इस प्रकार दशविध अवतार धारण करनेवाले हे भगवान् श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है॥१२॥ इति दशावतार कीर्त्तिधवलो नाम प्रथमः प्रबन्धः। इस प्रकार प्रथम प्रबन्धमें दशावतार स्तोत्र कीर्त्तिधवल नामक छन्द है। प्रस्तुत प्रबन्धमें पारस्वर, मध्यमादि राग, आदि ताल, विलम्बित लय, माध्यमी रीति तथा शृङ्गार रस है। इसमें वासुदेव भगवान्के यशका वर्णन है॥ इति श्रीगीतगोविन्दे प्रथमः सन्दर्भः। अथ द्वितीय सन्दर्भः। गीतम् ॥२॥ गुर्ज्जरी राग निःसार तालाभ्यां गीयते अनुवाद—गुर्ज्जरी राग तथा निःसार तालसे यह द्वितीय प्रबन्ध गाया जाता है। गुर्ज्जरी राग—श्यामा नायिकाके समान जो शीतकालमें उष्ण और ग्रीष्मकालमें सुशीतल होती है, जिसके स्तनयुगल सम्यक् रूपेण कठोर हैं, जिसके पदस्पर्श मात्रसे अशोक वृक्षमें असमय ही पुष्प प्रस्फुटित हो जाते हैं, जो मनोहर केशोंको धारण करनेवाली, मलय तरुवरकी कोमल पल्लवोंद्वारा सुसज्जित शय्यामें पहुँचती हैं, श्रुतिके दाहिनी ओरसे स्वरोंको धारण करती है। इसमें निःसार ताल जैसे दो ताल द्रुत और दो ताल लघु होते हैं। इसको गुर्ज्जरी राग कहा जाता है। श्रितकमलाकुच मण्डल! धृत-कुण्डल! कलित-ललित-वनमाल! जय जय देव हरे ॥१॥ध्रुवम्॥