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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

३६ श्रीगीतगोविन्दम् किया—इस प्रकार दशविध अवतार धारण करनेवाले हे भगवान् श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है॥१२॥ इति दशावतार कीर्त्तिधवलो नाम प्रथमः प्रबन्धः। इस प्रकार प्रथम प्रबन्धमें दशावतार स्तोत्र कीर्त्तिधवल नामक छन्द है। प्रस्तुत प्रबन्धमें पारस्वर, मध्यमादि राग, आदि ताल, विलम्बित लय, माध्यमी रीति तथा शृङ्गार रस है। इसमें वासुदेव भगवान्के यशका वर्णन है॥ इति श्रीगीतगोविन्दे प्रथमः सन्दर्भः। अथ द्वितीय सन्दर्भः। गीतम् ॥२॥ गुर्ज्‍जरी राग निःसार तालाभ्यां गीयते अनुवाद—गुर्ज्‍जरी राग तथा निःसार तालसे यह द्वितीय प्रबन्ध गाया जाता है। गुर्ज्‍जरी राग—श्यामा नायिकाके समान जो शीतकालमें उष्ण और ग्रीष्मकालमें सुशीतल होती है, जिसके स्तनयुगल सम्यक् रूपेण कठोर हैं, जिसके पदस्पर्श मात्रसे अशोक वृक्षमें असमय ही पुष्प प्रस्फुटित हो जाते हैं, जो मनोहर केशोंको धारण करनेवाली, मलय तरुवरकी कोमल पल्लवोंद्वारा सुसज्जित शय्यामें पहुँचती हैं, श्रुतिके दाहिनी ओरसे स्वरोंको धारण करती है। इसमें निःसार ताल जैसे दो ताल द्रुत और दो ताल लघु होते हैं। इसको गुर्ज्‍जरी राग कहा जाता है। श्रितकमलाकुच मण्डल! धृत-कुण्डल! कलित-ललित-वनमाल! जय जय देव हरे ॥१॥ध्रुवम्॥

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३७ दिनमणि-मण्डल-मण्डन! भवखण्डन! मुनिजन-मानस-हंस! जय जय देव हरे ॥२॥ कालिय-विषधर-गञ्जन! जनरञ्जन! यदुकुल-नलिन-दिनेश! जय जय देव हरे ॥३॥ मधु-मुर-नरक-विनाशन! गरुडासन! सुरकुल-केलि-निदान! जय जय देव हरे ॥४॥ अमल-कमल-दललोचन! भव मोचन। त्रिभुवन भवन-निधान! जय जय देव हरे ॥५॥ जनक-सुता-कृत-भूषण! जितदूषण! समर-शमित-दशकण्ठ! जय जय देव हरे ॥६॥ अभिनव-जलधर-सुन्दर! धृतमन्दर! श्रीमुखचन्द्र-चकोर! जय जय देव हरे ॥७॥ तव चरणे प्रणता वयम् इति भावय। कुरु कुशलं प्रणतेषु, जय जय देव हरे ॥८॥ श्रीजयदेवकवेरिदं कुरुते मुदम्। मङ्गलमुज्ज्वलगीतम् जय जय देव हरे ॥९॥ —★—

३८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रितकमलाकुचमण्डल ! धृत कुण्डल ! कलित-ललित-वनमाल ! जय जय देव हरे ॥१॥ ध्रुवम् ॥ अन्वय-[इदानीं परव्योमनाथत्वेन धीरललितत्वमाह-हे श्रितकमलाकुचमण्डल (श्रितं धृतं कमलाया लक्ष्म्याः कुचमण्डलं स्तनयुगलं येन तत्सम्बुद्धौ) अनेन विदग्धत्वपरिहासविशारदत्व- प्रेयसीवशतत्वनिश्चिन्तत्वानि सुचितानि] हे धृतकुण्डल (धृते कुण्डले तत्सम्बुद्धौ) हे कलितललितवनमाल (कलिता धृता ललिता सुन्दरी वनमाला येन तत्सम्बुद्धौ); [एतेन विशेषणद्वयेन नवतारुण्यत्वं सूचितम्, तेनैव वेशविन्याससिद्धेः] हे देव, हरे, जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“विदग्धो नव-तारुण्यः परिहास- विशारदः। निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥”] ॥१॥ अनुवाद-हे श्रीराधाजीके स्तन मण्डलका आश्रय लेनेवाले ! कानोंमें कुण्डल तथा अतिशय मनोहर वनमाला धारण करनेवाले हे हरे ! आपकी जय हो ॥ अथवा हे देव ! हे हरे ! हे कमला कुचमण्डल बिहारी ! हे कुण्डल भूषण धारि ! हे ललित मालाधर ! आपकी जय हो ॥१॥ पद्यानुवाद- धृत कमला कुच मण्डल श्रुतिकुण्डल हे। कलित ललित वनमाल जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी-कवि श्रीजयदेवजी श्रीकृष्णको सबके उपास्य रूपमें वर्णितकर अब दूसरे गीति-प्रबन्धमें एकमात्र चिन्तनीय स्वरूप ध्येयरूपमें वर्णन हेतु धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरशान्त और धीरललित आदि नायकत्व गुणोंसे समन्वित समस्त नायक-चूड़ामणि श्रीकृष्णकी सर्वश्रेष्ठताको प्रकटित करते हुए प्रार्थना करते हैं। श्रित कमला कुचमण्डल हे-इस पदका विग्रह है-श्रित कमलायाः कुचमण्डलं येनाऽसौ तत्सम्बुद्धौ श्रितकमलाकुचमण्डल

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३९ अर्थात् श्रीकृष्ण श्रीराधाजीके स्तनमण्डलीकी सेवा करनेवाले हैं। वे लक्ष्मीजीके प्रिय हैं तथा श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रियतमा हैं। इस पदसे यह भी सूचित होता है कि वे श्रीकृष्ण क्रीड़ाविलासी, विदग्ध, परिहास विशारद, प्रेयसीवश एवं निश्चिन्त हैं। 'ए'कार आलाप मात्र है। धृतकुण्डल ए, धृते कुण्डल येन स तथा तस्य सम्बुद्धिः, अर्थात् जिन्होंने कानोंमें कुण्डल धारण किया है, मकराकृति कुण्डल धारण करनेसे उनके मुखारविन्दकी शोभा और भी बढ़ जाती है। कलित ललित वनमाल—आपने अतिशय मनोहर वनमालाको धारण किया है। विश्वकोषकार कहते हैं— आपादलम्बिनी माला वनमालेति तां विदुः। पत्रपुष्पमयी माला वनमाला प्रकीर्त्तिता॥ अर्थात् पैरपर्यन्त लटकनेवाली मालाको वनमाला कहते हैं। वनमाला पत्र एवं पुष्पोंसे बनी हुई होती है। इस प्रकार तीनों विशेषणोंसे श्रीकृष्णका नवतारुण्य द्योतित होता है, उनका वेशविन्यास भी प्रकाशित होता है—नवकिशोर नटवर गोपवेश वेणुकर। हरे—हे श्रीकृष्ण ! आप सबके चित्त, मन एवं प्राणोंको आकर्षित करते हैं, साथ ही सबके मध्यमें अपनी लीला चमत्कारिता प्रकट करते हैं। इससे आपका उत्कर्ष उजागर हो रहा है। इस गीतिके प्रत्येक पदके अन्तमें 'जय जय देव हरे'—इस ध्रुव पदकी संयोजना है। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीकृष्णका धीरललितत्व चित्रित हो रहा है, जैसाकि धीरललित नायकका लक्षण है—विदग्ध, नवतरुण, विशारद, निश्चिन्त एवं प्रेयसीवश्यता। 'ए'-कार का प्रयोग गानकी वेलामें रागपूर्त्तिके लिए हुआ है॥१॥

४० श्रीगीतगोविन्दम् दिनमणि-मण्डल-मण्डन! भवखण्डन! मुनिजन-मानस-हंस! जय जय देव हरे॥२॥ अन्वय—[अथ सवितृमण्डलान्तर्ध्येयत्वेन धीरशान्तत्वमाह]—हे दिनमणिमण्डलमण्डन (हे सवितृमण्डलभूषण) [अनेन क्लेशसहत्वं विनयादिगुणोपेतत्वञ्च सूचितम्]; [अतएव] हे मुनिजनमानस-हंस (मुनिजनानां मानसं चित्तं तदाख्यः सरइव तत्र स्थित हंस) [हंसो जलचरजीवविशेषः तदाख्यपरममन्त्रस्वरूपश्च]; [अनेन समप्रकृतिकत्वं विनयादिगुणोपेतत्वञ्च सूचितम्]; हे भवखण्डन (भवं संसारं खण्डयतीति तत्सम्बुद्धौ, संसारबन्धखण्डनकृत्), हे देव, हरे, जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“सम प्रकृतिकक्लेश- सहनश्च विवेचकः। विनयादिगुणोपेतो धीरशान्त उदीर्यते”] ॥२॥ अनुवाद—हे देव! हे हरे! हे सूर्य-मण्डलको विभूषित करनेवाले, भव-बन्धनका छेदन करनेवाले! मुनिजनोंके मानस सरोवरमें विहार करनेवाले हंस! आपकी जय हो! जय हो॥२॥ पद्यानुवाद— दिनमणि मण्डित भव खण्डित हे। मुनिजन मानस हंस जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—दिनमणि मण्डल मण्डन! श्रीभगवान्‌का सूर्यमण्डलके भीतर अन्तर्यामी रूपमें निवास है। वे ध्येय एवं चिन्तनीय हैं। ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती, नारायणः सरसिजासन सन्निविष्टः। जैसे सूर्यमण्डल सभीके द्वारा पूज्य हैं, उसी प्रकार आप भी सबके द्वारा चिन्तनीय एवं उपास्य हैं। और भी कहा है—ज्योतिरुभ्यन्तरे श्यामसुन्दरमतुलं॥ भवखण्डन ए—एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः।

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४१ अर्थात् यह आत्मा स्वभावसे कर्मके बन्धनसे रहित, जरा, मृत्यु, शोक, मोह, भूख, प्याससे रहित सत्यकाम तथा सत्यसङ्कल्प है। संसार बन्धनमें पड़े रहनेसे ये गुण तिरोहित हो जाते हैं और भगवान्‌की कृपा होनेपर आविर्भूत हो जाते हैं। इसलिए 'भवखण्डन' कहकर भगवान् श्रीकृष्णको सम्बोधित किया है। मुनिजनमानसहंस—मुनिजनानां मानसानि इव मानसानि तेषु हंस इव हंस-अर्थात् मननशील मुनियोंके मानसरूप मानसरोवरमें श्रीभगवान् उसी प्रकार विहार करते हैं, जैसे राजहंस मानसरोवरमें। आपके विहार करनेसे इन मुनियोंमें सदा स्फूर्ति होती रहती है। ये मुनिगण सम प्रकृति होकर कष्ट सहन करते हैं और विनय आदि गुणोंसे सम्पन्न होकर भजन करते हैं। भगवान्‌की कृपा होनेसे ये संसारसे विरक्त हो जाते हैं। देव-दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण भगवान्‌को 'देव' शब्दसे अभिहित किया है। जय-इस क्रियापदका प्रयोग कविकी आदरातिशयताका द्योतक है। प्रस्तुत पदके नायक धीरशान्त हैं ॥२॥ कालिय-विषधर-गञ्जन जनरञ्जन ! यदुकुल-नलिन-दिनेश ! जय जय देव हरे ॥३॥ अन्वय-[ध्येयविशेषत्वेन धीरोद्धतत्वमाह द्वाभ्याम्]—हे कालियविषधरगञ्जन (कालियसर्पदमन) हे जनरञ्जन (जनसन्तोष) हे यदुकुल-नलिन-दिनेश (यदुकुलान्येव नलिनानि तेषां दिनेशः सूर्यइव तत्सम्बुद्धौ) हे देव, हरे जय जय [“मात्सर्यवानहङ्कारी मायावी रोषणश्चलः। विकत्थनश्च विद्वद्भिर्धीरोद्धत उदाहृत।” अत्र कालियेत्यादिना मात्सर्यवत्त्वं जनरञ्जनेत्यादिना यदुकुलेत्यादिना च अहङ्कारित्वम् अहन्तया ममच जनरञ्जनादिसिद्धेः] ॥३॥

४२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे देव! हे हरे! विषधर कालिय नामके नागका मद चूर्ण करनेवाले, निजजनोंको आह्लादित करनेवाले, हे यदुकुलरूप कमलके प्रभाकर! आपकी जय हो! जय हो॥३॥ पद्यानुवाद— कालिय विषधर गञ्जन जन रञ्जन हे। यदुकुल नलिन दिनेश जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—कवि श्रीकृष्णको अपना उपास्य होनेपर भी ध्येय विषयके रूपमें स्तुति कर रहे हैं। इसमें श्रीकृष्णका धीरोद्धत नायकत्व प्रस्तुत किया जा रहा है। कालिय विषधर गञ्जन—श्रीकृष्ण भगवान्ने यमुनामें रहनेवाले (कालिय दहमें) कालिय नामक सौ फणवाले महा विषधर सर्पका गर्व खर्व (चूर्ण) कर दिया। जन-रञ्जन ए—भगवान्ने कालिय दमनसे व्रजजनोंको आह्लादित किया। श्रीकृष्ण भलीभाँति जानते हैं कि व्रजजन उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते, यहाँतक कि वे मेरे बिना प्राण भी धारण नहीं कर सकते, उनकी रक्षा, उनका अनुरञ्जन श्रीकृष्णको भी करणीय हो जाता है। हे जन अनुरञ्जन कारिन्! आपकी जय हो!! यदुकुल-नलिन-दिनेश—गोपगण ही यादव हैं। अतएव भगवान् ही गोकुलके प्रकाशक हैं। जिस प्रकार भास्करके उदित हो जानेपर अरविन्द प्रफुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्के द्वारा यदुवंशमें अवतार ग्रहण करनेसे यदुवंश विकसित हुआ है। प्रस्तुत पदमें श्रीभगवान्को बलशाली, जन-आह्लादकारी गुणसम्पन्न एवं कुलीन बताया है। अतः हे देव! आप हम जैसे मात्सर्य भावयुक्त अहङ्कारियोंका अहङ्कार चूर्णकर हमारा अनुरञ्जन करें। धीरोद्धत—मात्सर्यवान्, अहङ्कारी, मायावी, रोष-परायण, चञ्चल, विकथनकारी नायकको धीरोद्धत नायक कहा जाता है॥३॥

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४३ मधु-मुर-नरक-विनाशन ! गरुड़ासन ! सुरकुल-केलि-निदान ! जय जय देव हरे ॥४॥ अन्वय—हे मधु-मुर-नरकविनाशन ! (मध्वादीनां विनाशकृत्) गरुड़ासन ! (गरुड़वाहन) सुरकुलकेलिनिदान ! (सुराणां कुलं तस्य केलिः स्वच्छन्दविहारः तस्य निदान कारण); [असुराणां निधनेन तेषामकुतोभयत्वादिति भावः]; [एतेन मायावित्वादि चतुष्टयमुक्तं भवति] हे देव, हरे, जय जय ॥४॥ अनुवाद—हे देव ! हे हरे ! हे मधुसूदन ! हे मुरारे ! हे नरकान्तकारी ! हे गरुड़-वाहन ! हे देवताओंके क्रीड़ा-विहार-निदान, आपकी जय हो ! जय हो ॥४॥ पद्यानुवाद— मधु-मुर नरक विनाशन, गरुड़ासन हे। सुरकुल केलि निदान, जय जय देव हरे ॥ बालबोधिनी—मधु-मुर-नरक विनाशन—श्रीकृष्णके तीन लोक हैं, जहाँ वे नित्य-लीलाविलास करते हैं। गोकुल, मथुरा एवं द्वारका। इन धामोंमें लीलाविलास करते हुए श्रीकृष्णमें नायकत्वके छियानवे लक्षण दिग्दर्शित हुए हैं। प्रस्तुत स्तवनांशमें उनका धीरोद्धत्तत्व प्रकाशित हो रहा है। श्रीकृष्णने द्वारकापुरीमें रहते हुए मधुदैत्य एवं नरकासुर आदिका संहार किया है। इस भावको मधु-मुर-नरक विनाशन पदसे अभिव्यक्त किया है। गरुड़ासन ए—गरुड़ आसनं यस्य तत्सम्बुद्धौ—यह गरुड़ासन पदका विग्रह है। पक्षिराज गरुड़का पृष्ठ भगवान्‌का आसन है। अतः भगवान्‌को गरुड़ासन अथवा गरुड़वाहन कहा जाता है। सुरकुल-केलिनिदान—असुरोंका संहारकर भगवान् देवताओंका आनन्दवर्द्धन किया करते हैं। वे भक्तजनोंके साथ आनन्द विहार करते हैं।

१. सर्ग २-३: अक्लेशकेशव व मुग्धमधुसूदन

४४ श्रीगीतगोविन्दम् यहाँ श्रीकृष्णका मायावित्व भी भासित हो रहा है। हे हरे ! आपकी जय हो ॥४॥ अमल-कमल-दललोचन ! भव मोचन ! त्रिभुवन भवन-निधान ! जय जय देव हरे ॥५॥ अन्वय—[सर्वतापोपशमनपूर्वकसर्वाभीष्टप्रदतया देवसहायक- रूपेण धीरोदात्तमाह]—हे अमलकमलदललोचन (प्रफुल्लपद्मपत्रे इवलोचने यस्य, हे तादृश) [एतेन तापशमकत्वम्]; हे भवमोचन (संसारक्लेशहर) [एतेन करुणत्वं]; हे त्रिभुवन- भवननिधान (त्रिभुवनमेव भवनं गृहं तस्य निधानं निधिरिव अमूल्यरत्नमित्यर्थः, तत्सम्बुद्धौ); [एतेन विनयित्वम्; हे देव, हरे, जय जय। [“गम्भीरो विनयी क्षन्ता करुणः सुदृढ़व्रतः। अकत्थनो गूढ़गर्वो धीरोदात्तः सुसत्त्वभृत् ॥”] ॥५॥ अनुवाद—हे देव! हे हरे ! हे निर्मल कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, भव-दुःख मोचन करनेवाले, त्रिभुवनरूप भवनके आधार स्वरूप, आपकी जय हो, जय हो ॥५॥ पद्यानुवाद— अमल कमल दल लोचन, भव-मोचन हे। त्रिभुवन भवन निधान, जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—पाँचवें पद्यमें श्रीकृष्णके धीरोदात्त गुणको अभिव्यक्त कर रहे हैं। अमल-कमल-दललोचन—अमले ये कमलदले ते इव लोचने यस्याऽसौ तथाविधः तत् सम्बुद्धौ अर्थात् जिनके नेत्र अमल कमल दलके समान निर्मल हैं। नेत्रयुगल सभीके तापोंका प्रशमनकर चित्त, मन और प्राणोंका हरण कर लेते हैं— तेरछे नेत्रान्त वाण विन्धे गोपीगण-प्राण। भवमोचन, सभी भक्तोंके संसार बन्धनका मोचन करते हैं, जीवोंकी रक्षा करते हैं। इस पदसे भगवान्‌का कारुण्य भी द्योतित हो रहा है।

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४५ त्रिभुवन-भवन-निधान—श्रीहरि त्रैलोक्यव्यापक हैं, वे त्रैलोक्यरूपी भवनके निधिस्वरूप हैं, कारण हैं, जनक हैं—इस तरह आपमें विनयीत्व गुणका प्रकाश होता है। आपकी जय हो। धीरोदात्त—गम्भीर, विनयी, क्षमाशील, करुण, सुहृद्व्रती, अकथ्य कथनकारी, गुण गर्वीले तथा महान् सत्यपरायण आदि धीरोदात्तके गुण श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं॥५॥ जनक-सुता-कृतभूषण ! जितदूषण ! समर-शमित-दशकण्ठ ! जय जय देव हरे ॥६॥ अन्वय—हे जनकसुताकृतभूषण (जनकसुतया सीतया कृतं भूषणम् अलङ्कारः यस्य; यद्वा जनक सुतायाः कृतं भूषणं येन तत्सम्बुद्धौ; हे सीताकृतालङ्कार; यद्वा कृतसीतालङ्कार), एतेन सुदृढ़व्रतत्वम्]; हे जितदूषण (जितः दूषणः दण्डकारण्यचरो राक्षसविशेषः येन अथवा जितं दूषणं दोषजननं कार्यं येन तत्सम्बुद्धौ; दूषणजयिन् अथच दोषरहित), [एतेन अकथनत्वम्]; [तथा] समरशमितदशकण्ठ (समरे युद्धे शमितः नाशितः दशकण्ठो रावणो येन तत्सम्बुद्धौ) [एतेन क्षन्तृत्वगूढ़गर्वत्वसुसत्त्व- भृत्त्वानि] हे देव, हरे, जय जय ॥६॥ अनुवाद—हे देव ! हे हरे ! श्रीरामावतारमें सीताजीको विभूषित करनेवाले, दूषण नामक राक्षसपर विजय प्राप्त करनेवाले तथा युद्धमें दशानन रावणको वधकर शान्त करनेवाले, आपकी जय हो ! जय हो ॥६॥ पद्यानुवाद— जनक-सुता कृत भूषण, जितदूषण हे। समर शमित दशकण्ठ, जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—भगवान् श्रीकृष्णके श्रीरामावतारमें धीरोदात्त नायकत्व है। जनक-सुता-कृतभूषण—धीरोदात्त गुणोंसे विभूषित हे देव!

४६ श्रीगीतगोविन्दम् आप जनकसुताको अपने हाथोंसे समलंकृत करते हैं। आप नव दुर्वादलस्वरूप श्याम हैं। आपके द्वारा स्वर्णाङ्गी वैदेही विभूषित होती हैं। हे सुदृढ़ व्रतपरायण, आपकी जय हो। जितदूषण ए-जितदूषणो येनाऽसौ-आपने दूषण नामक राक्षसका वध कर दिया है। वनवासकालमें दण्डकारण्य नामक वनमें निवास करते हुए आप जितदूषण कहलाये। समर-शमित-दशकण्ठ-राक्षसराज रावण, जो संग्राममें स्थिर रहनेवाला संग्रामकारी और अकथ्य वचन बोलनेवाला, ऐसे महावीरको आपने रणप्राङ्गणमें धराशायीकर शान्त कर दिया। हे वीरोंके अधिपति ! हे हरे ! गूढ़गर्व तथा क्षमा गुणोंसे विभूषित आपकी जय हो ॥६॥ अभिनव-जलधर-सुन्दर ! धृतमन्दर ! श्रीमुखचन्द्रचकोर ! जय जय देव हरे ॥७॥ अन्वय—[अधुना धीरललितमुख्यत्वप्रतिपादनाय अजित- रूपत्वेन सम्पुटितमिव पुनस्तमेवाह]—हे अभिनव जलधर-सुन्दर (नवजलधररूचे) हे धृतमन्दर (मन्दरधारिन्) [आभ्यां नवतरुणत्वं तदधिगमः]; हे श्रीमुखचन्द्रचकोर (श्रियः लक्ष्म्याः मुखमेव चन्द्रः तत्र चकोरइव तत्सम्बुद्धौ; कमलावदनचन्द्रसुधापायिन् इत्यर्थः) [अनेन प्रेयसीवशत्वं सूचितम्] हे देव, हे हरे, त्वं जय जय ॥७॥ अनुवाद—हे नवीन जलधरके समान वर्णवाले श्यामसुन्दर ! हे मन्दराचलको धारण करनेवाले ! श्रीराधारूप महालक्ष्मीके मुखचन्द्रपर आसक्त रहनेवाले चकोर-स्वरूप ! हे हरे ! हे देव ! आपकी जय हो ! जय हो ॥७॥ पद्यानुवाद— अभिनव जलधर सुन्दर धृत मन्दर हे। श्रीमुख चन्द्र चकोर, जय जय देव हरे॥

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४७ बालबोधिनी—प्रस्तुत पद्यमें धीरललित नायकका मुख्यत्व प्रतिपादन करते हुए भगवान्के विविध अवतारोंकी लीलाओंका प्रदर्शन किया है। अभिनव-जलधर-सुन्दर—श्रीभगवान् अभिनव सुन्दर हैं, उनका दिव्यातिदिव्य मङ्गलमय विग्रह सजल मेघके समान मनोहर है। धृतमन्दर—क्षीरसागरके मन्थन कालमें आपने मन्दराचलको धारण किया था। जब मन्दराचल ठहर नहीं रहा था, तब आप कच्छप बन गये थे अथवा श्रीराधाजीके हृदय देशको धारण करते हैं। दूसरे रूपमें देवताओंके साथ समुद्रका मन्थन करते हैं। श्रीमुखचन्द्र चकोर—श्रीराधाजीका मुखकमल भगवान्को आह्लादित करते रहनेके कारण विधु सरीखा है। चकोर जैसे चन्द्रमाकी ओर अस्पृह रूपमें निर्निमेष नेत्रोंसे देखा करता है, उसी प्रकार श्रीभगवान् भी श्रीराधाजीके मुखकी मनोज्ञताको देखकर हर्षातिरेकताका अनुभव करते रहते हैं। हे देव! हे हरे! आपकी जय हो!! नवजलधर सुन्दर पदसे भगवान्का नवतारुण्य द्योतित होता है। चकोर पदसे उनकी प्रेयसीवश्यता सूचित होती है। धृतमन्दर पदसे श्रीराधाजीके कुचयुगलको धारण करते हैं। हे प्रभो! आपकी जय हो॥७॥ तव चरणे प्रणता वयम् इति भावय। कुरु कुशलं प्रणतेषु, जय जय देव हरे ॥८॥ अन्वय—अथ श्रोतृषु वक्तृषुच प्रसादं प्रार्थयते—हे हरे! वयं तव चरणे प्रणताः इति भावय (चिन्तय—जानीहि); [ज्ञात्वाच] प्रणतेषु (अस्माषु) कुशलं कुरु (देहि); त्वल्लीला- नुभवसमर्थ कुरु। (त्वल्लीलानुभवस्य त्वत्प्रसादं विनानुपपत्तेः परमानन्दरूपत्वादित्यर्थः) हे देव, हरे जय जय॥८॥

४८ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे भगवन्! हम आपके चरणोंमें शरणागत हैं। आप प्रेमभक्ति प्रदानकर अपने प्रति प्रणतजनोंका कुशल विधान करें। हे देव! हे हरे! आपकी जय हो! जय हो॥८॥ पद्यानुवाद— तव चरणोंमें हम नत हे। करो कुशल अखिलेश! जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत पद्यमें कवि अपने श्रोताओं और वक्ताओंके कल्याणके लिए श्रीकृष्णके अनुग्रहकी प्रार्थना कर रहे हैं। हे कल्याण गुणाकर! हम आपके चरणोंमें प्रणत हैं। अतएव आप हम शरणागतोंका कल्याण करें। भक्तोंके पाप और तापका विनाश करें। आप परमानन्दस्वरूप हैं, वैसे ही आपकी लीला परमानन्दस्वरूप है, आप इन लीलाओंको हमारे हृदयमें स्फूर्तिप्राप्त करवाकर हम सबका आनन्दवर्द्धन करें ॥८॥ श्रीजयदेवकवेरिदं कुरुते मुदम्। मङ्गलमुज्ज्वलगीतम्, जय जय देव हरे॥९॥ अन्वय—श्रीजयदेवकवेः इदम् उज्ज्वलगीतं (उज्ज्वलं यथा तथा गीतं) मङ्गलं (माङ्गलिकं वचनम् अथवा मङ्गलाचरणमात्रं कर्त्तृ) मुदं (हर्षं) कुरुते (जनयति; तव भक्तानां चेतसीति शेषः) हे देव हरे त्वं जय जय॥९॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि प्रणीत यह मनोहर, उज्ज्वल गीतिमय मङ्गलाचरण आपका आनन्द वर्द्धन करें अथवा आपके गुणोंके श्रवण कीर्त्तन करनेवाले भक्तजनोंको आनन्द प्रदान करें। आपकी जय हो! जय हो॥९॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव लिखित यह सुन्दर। मङ्गल उज्ज्वल गीत जय जय देव हरे॥

प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ४९ बालबोधिनी-कवि श्रीजयदेवजी भगवान्‌की स्तुतिकी समाप्तिपर निवेदन करते हैं कि मैंने मङ्गलाचरणमें उज्ज्वल रसकी गीति तथा श्रीराधामाधवके केलिविलास-वर्णन करनेका सङ्कल्प लिया तो इससे मेरा हृदय आनन्दसे अतिशय तरङ्गायित हो उठा है। यदि मङ्गलाचरणमें ही इतना आनन्द है, तब श्रीराधामाधवके केलिविलास वर्णन करनेमें न जाने कितना आनन्द होगा। यह मेरा मनोहर मङ्गल गीत आपके लिए आनन्दप्रद बने, सुनने-सुनानेवालोंका भी कल्याणप्रद बने। मङ्गलाचरणके इन नौ श्लोकोंमें मङ्गल छन्द है॥९॥ पद्मापयोधर-तटी-परिरम्भ-लग्न- काश्मीर-मुद्रितमुरो मधुसूदनस्य व्यक्त्तानुरागमिव खेलदनङ्गखेद- स्वेदाम्बु पूरमनुपुरयतु प्रियं वः ॥ अन्वय-[एवं प्रार्थ्य श्रोतॄन् प्रति आशिषमातनोति]- पद्मापयोधरतटी-परिरम्भ-लग्नकाश्मीरमुद्रितम् (पद्माया लक्ष्म्या या पयोधरतटी कुचपरिणाहः स्तन-परिसर इति यावत्, तस्य परिरम्भणेन आलिङ्गनेन लग्नं यत् काश्मीरं कुङ्कुमं तेन मुद्रितं चिह्नितं) [अतः] व्यक्तानुरागम् (व्यक्तः स्पष्टीभूतोऽनुराग आसक्तिः यत्र तादृशम्) इव [तथा] खेलदनङ्ग-खेद-स्वेदाम्बुपूरम् (खेलन् क्रीडन् यः अनङ्गस्तेन यः खेदः आयासः तेन स्वेदाम्बुपूरः घर्मजलप्रवाहः यत्र तथाभूतं) मधुसूदनस्य उरः (वक्षः) वः (युष्माकं) प्रियम् अनूपूरयतु (निरन्तरं विदधातु) [अन्तरुच्छलितः प्रियानुरागो बहिः काश्मीररूपेण उरसि आविर्भूत इवेत्यर्थः॥ अनुवाद-पद्मा श्रीराधाजीके कुङ्कुम छापसे चिह्नित स्तन- युगलका परिरम्भण करनेसे जिन श्रीकृष्णका वक्षःस्थल

५० श्रीगीतगोविन्दम् अनुरञ्जित हो गया है, मानो हृदयस्थित अनुराग ही रञ्जित होकर व्यक्त होने लगा है, साथ ही कन्दर्पक्रीड़ाके कारण जात स्वेद-विन्दुओंसे जिनका वक्षःस्थल परिप्लुत हो गया है, ऐसे मधुसूदनका सम्भोगकालीन वक्षःस्थल आप सबका (हम सबका) मनोरथ पूर्ण करें। पद्यानुवाद— हरि हरे व्यथा सब मनकी जिनके वक्षस्थलपर अङ्कित केशर कमला स्तनकी। जिनपर छाई शोभा रतिके श्रमके मंजुलकणकी हरि हरे व्यथा सब मनकी ॥ बालबोधिनी—कवि श्रीजयदेवजीने पूर्व गीतिमें प्रभुसे प्रार्थना करनेके उपरान्त श्रोताओंको आशीर्वाद प्रदान करनेके लिए प्रस्तुत श्लोककी अवतारणा की है। पद्मापयोधर तटी—जब व्रजविलासी श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमाका आलिङ्गन करते हैं, तो उनके स्तनोंके प्रान्त-भाग तक लगे हुए कुंकुम-केशर द्रवकी छाप भगवान्‌के वक्षःस्थलपर अङ्कित हो जाती है। श्रीराधाजीसे सर्वाधिक प्रीति रखनेके कारण उनका हृदय राधिकानुरागसे रञ्जित रहता है (अनुरागका रङ्ग रक्तवर्ण होता है)। पयोधर तटी पदसे स्तनोंका उन्नतत्व तथा प्रान्त भागको पर्वतकी तलहटीके समान सूचित किया है। परिरम्भ लग्न काश्मीर—स्तन तटोंमें लेपित काश्मीर द्रवसे संलग्न श्रीकृष्णका वक्षःस्थल दीर्घकालपर्यन्त किये गये प्रगाढ़ आलिङ्गनको सूचित करता है। मुद्रित मुरो—श्रीस्वामिनीजीका कुचकुंकुम श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें मुद्रण यन्त्रकी भाँति चिह्नित हो गया है। वह अमिट रूपसे सुशोभित हो रहा है। अहो! धन्य है स्नेहातिशयता। व्यक्तानुरागमिव—जो अनुरागविशिष्ट हृदयमें सन्निहित

प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ५१ (छिपा हुआ) था, वह अब स्पष्ट रूपसे अभिव्यक्त हो गया। अब यह अनुरागरञ्जित हृदय अन्यत्र संलिप्त नहीं हो सकेगा, इसलिए इसे प्रकट कर दिया है। खेलदना-खेद स्वेदाम्बुपुरम् - श्रीकृष्णका अनुराग-रङ्गसे रञ्जित वक्षःस्थल दीर्घकालीन कन्दर्पकीड़ाके कारण परिश्रान्त होनेसे स्वेदवारिसे पूर्ण हो गया है अथवा श्रीश्यामके विशाल वक्षःस्थलमें घर्मबिन्दुओं (पसीनेके बूँदों) से सिक्त कुंकुम राग उनके हृदयस्थित अनुरागको मानो काश्मीर-रङ्गके रूपमें बाहर प्रकट कर रहा है। अनुपूरयतु प्रियं वः- इस प्रकार अनुराग-केशरसे रञ्जित श्रीकृष्णका वक्षस्थल हमारे अभीष्टको पूर्ण करे। हमारे हृदयमें प्रेमका वर्द्धन करे। प्रस्तुत श्लोक वसन्त रागमें गाया जाता है, इससे भगवान्‌के वासन्तिक स्वरूपका भी सङ्केत प्राप्त होता है। यहाँ नायिका मुग्धा, नायक कुशल, वसन्ततिलका वृत्त, आशीः, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास अलङ्कार तथा शृङ्गार रस है ॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे द्वितीयः सन्दर्भः। अथ तृतीयः सन्दर्भः। वसन्ते वासन्ती-कुसुम-सुकुमारैरवयवै- र्भ्रमन्तीं कान्तारे बहुबिहित-कृष्णानुसरणाम्। अमन्दं कन्दर्पज्वरजनितचिन्ताकुलतया बलद्बाधां राधां सरसमिदमूचे सहचरी ॥१॥ अन्वय - [श्रीराधाया अष्टनायिकावस्थां वर्णयन् सम्भोगपोषक- विप्रलम्भ-शृङ्गार-वर्णनाय प्रथमं विरहोत्कण्ठितामाह] - काचित् सहचरी (सखी) वसन्ते (वसन्तकाले) वासन्तीकुसुमसुकुमारैः

५२ श्रीगीतगोविन्दम् (वासन्तीपुष्पैरिव सुकुमारैः यूथिकाकुसुमपेलवैरित्यर्थः) अवयवैः (अङ्गै रुपलक्षितमित्यर्थः) कान्तारे (निविडे वने) भ्रमन्तीं बहु-विहित-कृष्णानुसरणम् (बहु यथातथा विहितं कृतं कृष्णानुसरणं यया ताम्) [अतएव] अमन्दं (नितान्तं) कन्दर्पज्वरजनितचिन्ताकुलतया (कामसन्तापजनिता या चिन्ता उत्कण्ठा तया आकुलतया कातरतया) बलद्वाधां (परिवर्द्धमान- मदनपीडां) राधाम् इदं (वक्ष्यमाणं) सरसं (रसवत्) वचः ऊचे ॥ अनुवाद—किसी समय वसन्त ऋतुकी सुमधुर बेलामें विरह-वेदनासे अत्यन्त कातर होकर राधिका एक विपिनसे दूसरे विपिनमें श्रीकृष्णका अन्वेषण करने लगी, माधवी लताके पुष्पोंके समान उनके सुकुमार अङ्ग अति क्लान्त हो गये, वे कन्दर्पपीडाजनित चिन्ताके कारण अत्यन्त विकल हो उठीं, तभी कोई एक सखी उनको अनुरागभरी बातोंसे सम्बोधित करती हुई इस प्रकार कहने लगी ॥१॥ पद्यानुवाद— कौन वह दुर्गम वनोंमें, त्रस्त-मातल डोलती है? फूल वासन्ती शरीरी, कृष्णका मन तोलती है? देखकर कन्दर्प ज्वरसे, क्रान्त; मनको खोलती है। एक सहचरी हो सदय यह, राधिकासे बोलती है— बालबोधिनी—प्रस्तुत पद्यमें महाकवि श्रीजयदेवजीने सर्वप्रथम श्रीराधामाधवके मङ्गलमय मधुर मिलनके द्वारा उनके महा उत्कर्षका वर्णन किया है। इसी उपक्रममें श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका वर्णन करनेसे कविका हृदय विकसित कमलकी भाँति आनन्दमें उछलित होने लगा है। इसलिए रसिक कविने दक्षिण, धृष्ट एवं शठ नायकके गुणोंसे विभूषित श्रीकृष्णको श्रीराधिकाके प्रति अनुकूल नायकके रूपमें प्रकट किया है। श्रीशुकदेवजीने जैसे 'सूची कटाह' न्यायसे अर्थात् स्वल्प परिश्रम-साध्य कार्यका सम्पादनकर पीछे बहु-परिश्रम-साध्य

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५३ कार्यको सम्पन्न करनेकी भाँति समस्त गोपियोंकी पहले श्रेष्ठता दिखलाकर अन्तमें श्रीराधाजीकी सर्वश्रेष्ठता प्रतिपादित की है। उसी प्रकार कविने श्रीराधामें आठ प्रकारके नायिका-लक्षणोंका वर्णन करते हुए श्रीराधाजीको सर्वनायिका- शिरोमणि सिद्ध किया है। [आठ प्रकारकी नायिका जैसे-१. अभिसारिका २. वासकसज्जा ३. उत्कण्ठिता ४. खण्डिता ५. विप्रलब्धा ६. कलहान्तरिता ७. प्रेषित-भर्त्तृका ८. स्वाधीन भर्त्तृका] प्रस्तुत श्लोकमें सम्भोग रसके पुष्टिकारक विप्रलम्भ शृङ्गारका वर्णन करते हुए विरहोत्कण्ठिता नायिका राधिकाका वर्णन कर रहे हैं। उद्दाम, मन्मथभावसे पीड़ित, महाज्वरग्रस्त, कम्पिताङ्गी, रोमाञ्चित, मलिनवपुमयी, पुनःपुनः मोहको प्राप्त होनेवाली वेपथुयुक्ता, सघनरूपसे पुलकित और उत्कण्ठिता होकर बोलनेवाली उत्कण्ठिता नायिकाके लक्षण भरतमुनिने नाट्यशास्त्रमें बताये हैं। शृङ्गार तिलक (१-७५) में विरहोत्कण्ठिता नायिकाके निम्नाङ्कित लक्षण बताये गये हैं— उत्का भवति सा यस्याः सङ्केतं नागतः प्रियः। तस्याऽनागमने हेतुं चिन्तयत्याकुला यथा॥ अर्थात् जिस नायिकाका नायक सङ्केतकालमें सङ्केत स्थानपर नहीं आता है, वह विरहोत्कण्ठिता नायिका कहलाती है, वह अपने प्रियतमके नहीं आनेके कारण सोच समझकर व्याकुल हो जाती है। यह श्लोक विप्रलम्भ शृङ्गार वर्णनकी भूमिका स्वरूप है। कवि कह रहे हैं कि वासन्तिक कालमें कोई एक सखी राधिकाजी से कहने लगी—“हे राधे! तुम्हारा शरीर माधवी पुष्पोंके समान अतिशय सुकोमल है और तुम यहाँ कण्टक कुशयुक्त, बीहड़ वनमें कान्त श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिए भ्रमण कर रही हो, इतना अन्वेषण करनेपर भी तुम्हें प्रियतम नहीं मिले। कन्दर्प-वाणसे पीड़ित, अति तीव्र कामज्वरसे सन्तप्त तुम उन्हें पानेकी लालसामें व्याकुल हो रही हो।”

५४ श्रीगीतगोविन्दम् प्रस्तुतपद्यमें 'वसन्त' पदके द्वारा कालरूपी उद्दीपन विभावको बतलाया है। 'चलद्'—यह पद श्रीराधाजीका विशेषण है, इससे सूचित होता है कि उन्होंने श्रीकृष्णको काननमें बार-बार अन्वेषण किया कि प्रियतम शायद अब आयें, अब आयें। 'वासन्ती सुकुमारयवै'—उन श्रीराधाजीके अङ्ग सुकुमार हैं। वासन्ती कुसुम अर्थात् माधवी लता। वसन्त ऋतुमें यह लता पूर्णतया विकसित हो जाती है, वासन्ती लताके पुष्प अत्यन्त मनोज्ञ तथा सुकुमार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाजीके अङ्ग अत्यन्त मनोहर तथा सुकुमार हैं—यह इस पदके द्वारा सूचित होता है। “हे सखी राधे! यह निश्चित है कि तुम्हारे प्राणनाथ श्रीकृष्ण तुम्हें छोड़कर किसी दूसरीके साथ विहार कर रहे हैं, शारदीया रास-रजनीमें प्रथम महोत्सवमें श्रीकृष्णने तुम्हारे असमोर्द्ध रूप-गुण माधुरीका अनुभव कर लिया था। तुम्हारे प्रति सर्वविदित अनुरागको वे सार्थक मानने लगे थे। अतः कदाचित् तुम्हारी सरीखी कोई इस व्रजमण्डलमें है या नहीं, यह जाननेके लिए पत्थरकी खुदाईकी क्रियाकी भाँति उसे ढूँढ़ते हुए कुछ दिनोंके लिए इधर उधर निकल गये हैं। अथवा तुम्हारे सदृश कोई है या नहीं यह जाननेकी इच्छासे श्रीकृष्णके अभिप्रायके अनुसार योगमायाने कंसको प्रेरणा दी और कंसने अक्रूरको नन्दगाँव भेजा, श्रीकृष्णने अक्रूरके साथ नारी संकुला बहुसंख्यक स्त्रियोंके सङ्गसे परिवेष्टित मथुरापुरीमें प्रस्थान किया। श्रीकृष्णने देखा, मथुरा मण्डलमें व्रजसुन्दिरियों जैसा सौन्दर्य किसीका नहीं और न ही उनके जैसा गुणाकर्षण है। तब इस चाहमें वे मानो द्वारकाके लिए प्रस्थान कर गये। द्वारकामें तब श्रीकृष्णने नरेन्द्र कन्याओंके साथ विवाह किया, वहाँ भी सफलता न मिलने पर नरकासुर द्वारा अपहृत गन्धर्व कन्या, यक्ष कन्या, नाग कन्या एवं मानव कन्याओं (जिनकी संख्या षोडश सहस्र है) से

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५५ विवाह कर लिया, फिर भी हे राधिके ! तुम्हारे समान किसीको भी न देखकर दन्तवक्र वधके पश्चात् पुनः ब्रजमें लौट आये हैं।” पद्मपुराणमें श्रीकृष्णके सुदीर्घ प्रवासके पश्चात् ब्रज आगमनका संवाद मिलता है— कृष्णोऽपि तं दन्तवक्रं हत्वा यमुनामुत्तीर्य नन्दव्रजं गत्वा सोत्कण्ठौ पितरौ अभिवाद्याश्वास्य ताभ्यां साश्रुकण्ठमालिङ्गितः सकल गोपवृन्दान् प्रणम्याश्वास्य सर्वान् सन्तर्पयामास ॥ अर्थात् श्रीकृष्ण दन्तव क्रका वध करनेके पश्चात् यमुना पार करके नन्दव्रजमें पहुँचे। वहाँ चिरोत्कण्ठित नन्द-यशोदाको प्रणाम आदि द्वारा आश्वासन दिया। उन दोनोंने आँसुओंसे स्नान कराते हुए श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर चिर व्यथाको प्रशमित किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने समस्त गोपवृन्दसे मिलकर उनके विरह दुख:को शान्त करके चिर-विरहिणी व्रजगोपियोंसे मिलकर उनकी तीव्र विरह पीड़ाको भी शान्त किया। श्रीमद्भागवतके प्रथम स्कन्धमें द्वारकावासी कह रहे हैं— यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान् कुरून्मधून् वाथ सुहृद्दिदृक्षया। तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद् रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत ॥ “हे कमलनयन ! जब आप सुहृद्जनोंके दर्शनके निमित्त कुरुदेश तथा मधुपुरीमें (व्रजमण्डलमें) गमन करते हैं, उस समय आपके विरहमें क्षणकाल भी कोटि युगके समान प्रतीत होता है। जैसे सूर्यके बिना आँखोंमें अन्धकार प्रतीत होता है वैसे ही आपके बिना चारों ओर शून्य प्रतीत होता है।” वसन्तमें गोपियोंका प्रियमिलन-जनित आनन्द तथा विरहीजनोंका प्रिय-विच्छेदजनित विरह दोनों ही मर्मस्पर्शी प्रसङ्ग हैं। इन्हीं बातोंका स्मरण कराती हुई सखी कहती है। प्रस्तुत पदमें शिखरिणी छन्द है, वैदर्भी रीति तथा उप नागरिका वृत्ति है।