गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ५१ (छिपा हुआ) था, वह अब स्पष्ट रूपसे अभिव्यक्त हो गया। अब यह अनुरागरञ्जित हृदय अन्यत्र संलिप्त नहीं हो सकेगा, इसलिए इसे प्रकट कर दिया है। खेलदना-खेद स्वेदाम्बुपुरम् - श्रीकृष्णका अनुराग-रङ्गसे रञ्जित वक्षःस्थल दीर्घकालीन कन्दर्पकीड़ाके कारण परिश्रान्त होनेसे स्वेदवारिसे पूर्ण हो गया है अथवा श्रीश्यामके विशाल वक्षःस्थलमें घर्मबिन्दुओं (पसीनेके बूँदों) से सिक्त कुंकुम राग उनके हृदयस्थित अनुरागको मानो काश्मीर-रङ्गके रूपमें बाहर प्रकट कर रहा है। अनुपूरयतु प्रियं वः- इस प्रकार अनुराग-केशरसे रञ्जित श्रीकृष्णका वक्षस्थल हमारे अभीष्टको पूर्ण करे। हमारे हृदयमें प्रेमका वर्द्धन करे। प्रस्तुत श्लोक वसन्त रागमें गाया जाता है, इससे भगवान्के वासन्तिक स्वरूपका भी सङ्केत प्राप्त होता है। यहाँ नायिका मुग्धा, नायक कुशल, वसन्ततिलका वृत्त, आशीः, उत्प्रेक्षा एवं अनुप्रास अलङ्कार तथा शृङ्गार रस है ॥१॥ इति श्रीगीतगोविन्दे द्वितीयः सन्दर्भः। अथ तृतीयः सन्दर्भः। वसन्ते वासन्ती-कुसुम-सुकुमारैरवयवै- र्भ्रमन्तीं कान्तारे बहुबिहित-कृष्णानुसरणाम्। अमन्दं कन्दर्पज्वरजनितचिन्ताकुलतया बलद्बाधां राधां सरसमिदमूचे सहचरी ॥१॥ अन्वय - [श्रीराधाया अष्टनायिकावस्थां वर्णयन् सम्भोगपोषक- विप्रलम्भ-शृङ्गार-वर्णनाय प्रथमं विरहोत्कण्ठितामाह] - काचित् सहचरी (सखी) वसन्ते (वसन्तकाले) वासन्तीकुसुमसुकुमारैः