भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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५२ श्रीगीतगोविन्दम् (वासन्तीपुष्पैरिव सुकुमारैः यूथिकाकुसुमपेलवैरित्यर्थः) अवयवैः (अङ्गै रुपलक्षितमित्यर्थः) कान्तारे (निविडे वने) भ्रमन्तीं बहु-विहित-कृष्णानुसरणम् (बहु यथातथा विहितं कृतं कृष्णानुसरणं यया ताम्) [अतएव] अमन्दं (नितान्तं) कन्दर्पज्वरजनितचिन्ताकुलतया (कामसन्तापजनिता या चिन्ता उत्कण्ठा तया आकुलतया कातरतया) बलद्वाधां (परिवर्द्धमान- मदनपीडां) राधाम् इदं (वक्ष्यमाणं) सरसं (रसवत्) वचः ऊचे ॥ अनुवाद—किसी समय वसन्त ऋतुकी सुमधुर बेलामें विरह-वेदनासे अत्यन्त कातर होकर राधिका एक विपिनसे दूसरे विपिनमें श्रीकृष्णका अन्वेषण करने लगी, माधवी लताके पुष्पोंके समान उनके सुकुमार अङ्ग अति क्लान्त हो गये, वे कन्दर्पपीडाजनित चिन्ताके कारण अत्यन्त विकल हो उठीं, तभी कोई एक सखी उनको अनुरागभरी बातोंसे सम्बोधित करती हुई इस प्रकार कहने लगी ॥१॥ पद्यानुवाद— कौन वह दुर्गम वनोंमें, त्रस्त-मातल डोलती है? फूल वासन्ती शरीरी, कृष्णका मन तोलती है? देखकर कन्दर्प ज्वरसे, क्रान्त; मनको खोलती है। एक सहचरी हो सदय यह, राधिकासे बोलती है— बालबोधिनी—प्रस्तुत पद्यमें महाकवि श्रीजयदेवजीने सर्वप्रथम श्रीराधामाधवके मङ्गलमय मधुर मिलनके द्वारा उनके महा उत्कर्षका वर्णन किया है। इसी उपक्रममें श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका वर्णन करनेसे कविका हृदय विकसित कमलकी भाँति आनन्दमें उछलित होने लगा है। इसलिए रसिक कविने दक्षिण, धृष्ट एवं शठ नायकके गुणोंसे विभूषित श्रीकृष्णको श्रीराधिकाके प्रति अनुकूल नायकके रूपमें प्रकट किया है। श्रीशुकदेवजीने जैसे 'सूची कटाह' न्यायसे अर्थात् स्वल्प परिश्रम-साध्य कार्यका सम्पादनकर पीछे बहु-परिश्रम-साध्य