गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५३ कार्यको सम्पन्न करनेकी भाँति समस्त गोपियोंकी पहले श्रेष्ठता दिखलाकर अन्तमें श्रीराधाजीकी सर्वश्रेष्ठता प्रतिपादित की है। उसी प्रकार कविने श्रीराधामें आठ प्रकारके नायिका-लक्षणोंका वर्णन करते हुए श्रीराधाजीको सर्वनायिका- शिरोमणि सिद्ध किया है। [आठ प्रकारकी नायिका जैसे-१. अभिसारिका २. वासकसज्जा ३. उत्कण्ठिता ४. खण्डिता ५. विप्रलब्धा ६. कलहान्तरिता ७. प्रेषित-भर्त्तृका ८. स्वाधीन भर्त्तृका] प्रस्तुत श्लोकमें सम्भोग रसके पुष्टिकारक विप्रलम्भ शृङ्गारका वर्णन करते हुए विरहोत्कण्ठिता नायिका राधिकाका वर्णन कर रहे हैं। उद्दाम, मन्मथभावसे पीड़ित, महाज्वरग्रस्त, कम्पिताङ्गी, रोमाञ्चित, मलिनवपुमयी, पुनःपुनः मोहको प्राप्त होनेवाली वेपथुयुक्ता, सघनरूपसे पुलकित और उत्कण्ठिता होकर बोलनेवाली उत्कण्ठिता नायिकाके लक्षण भरतमुनिने नाट्यशास्त्रमें बताये हैं। शृङ्गार तिलक (१-७५) में विरहोत्कण्ठिता नायिकाके निम्नाङ्कित लक्षण बताये गये हैं— उत्का भवति सा यस्याः सङ्केतं नागतः प्रियः। तस्याऽनागमने हेतुं चिन्तयत्याकुला यथा॥ अर्थात् जिस नायिकाका नायक सङ्केतकालमें सङ्केत स्थानपर नहीं आता है, वह विरहोत्कण्ठिता नायिका कहलाती है, वह अपने प्रियतमके नहीं आनेके कारण सोच समझकर व्याकुल हो जाती है। यह श्लोक विप्रलम्भ शृङ्गार वर्णनकी भूमिका स्वरूप है। कवि कह रहे हैं कि वासन्तिक कालमें कोई एक सखी राधिकाजी से कहने लगी—“हे राधे! तुम्हारा शरीर माधवी पुष्पोंके समान अतिशय सुकोमल है और तुम यहाँ कण्टक कुशयुक्त, बीहड़ वनमें कान्त श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिए भ्रमण कर रही हो, इतना अन्वेषण करनेपर भी तुम्हें प्रियतम नहीं मिले। कन्दर्प-वाणसे पीड़ित, अति तीव्र कामज्वरसे सन्तप्त तुम उन्हें पानेकी लालसामें व्याकुल हो रही हो।”