गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ श्रीगीतगोविन्दम् प्रस्तुतपद्यमें 'वसन्त' पदके द्वारा कालरूपी उद्दीपन विभावको बतलाया है। 'चलद्'—यह पद श्रीराधाजीका विशेषण है, इससे सूचित होता है कि उन्होंने श्रीकृष्णको काननमें बार-बार अन्वेषण किया कि प्रियतम शायद अब आयें, अब आयें। 'वासन्ती सुकुमारयवै'—उन श्रीराधाजीके अङ्ग सुकुमार हैं। वासन्ती कुसुम अर्थात् माधवी लता। वसन्त ऋतुमें यह लता पूर्णतया विकसित हो जाती है, वासन्ती लताके पुष्प अत्यन्त मनोज्ञ तथा सुकुमार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाजीके अङ्ग अत्यन्त मनोहर तथा सुकुमार हैं—यह इस पदके द्वारा सूचित होता है। “हे सखी राधे! यह निश्चित है कि तुम्हारे प्राणनाथ श्रीकृष्ण तुम्हें छोड़कर किसी दूसरीके साथ विहार कर रहे हैं, शारदीया रास-रजनीमें प्रथम महोत्सवमें श्रीकृष्णने तुम्हारे असमोर्द्ध रूप-गुण माधुरीका अनुभव कर लिया था। तुम्हारे प्रति सर्वविदित अनुरागको वे सार्थक मानने लगे थे। अतः कदाचित् तुम्हारी सरीखी कोई इस व्रजमण्डलमें है या नहीं, यह जाननेके लिए पत्थरकी खुदाईकी क्रियाकी भाँति उसे ढूँढ़ते हुए कुछ दिनोंके लिए इधर उधर निकल गये हैं। अथवा तुम्हारे सदृश कोई है या नहीं यह जाननेकी इच्छासे श्रीकृष्णके अभिप्रायके अनुसार योगमायाने कंसको प्रेरणा दी और कंसने अक्रूरको नन्दगाँव भेजा, श्रीकृष्णने अक्रूरके साथ नारी संकुला बहुसंख्यक स्त्रियोंके सङ्गसे परिवेष्टित मथुरापुरीमें प्रस्थान किया। श्रीकृष्णने देखा, मथुरा मण्डलमें व्रजसुन्दिरियों जैसा सौन्दर्य किसीका नहीं और न ही उनके जैसा गुणाकर्षण है। तब इस चाहमें वे मानो द्वारकाके लिए प्रस्थान कर गये। द्वारकामें तब श्रीकृष्णने नरेन्द्र कन्याओंके साथ विवाह किया, वहाँ भी सफलता न मिलने पर नरकासुर द्वारा अपहृत गन्धर्व कन्या, यक्ष कन्या, नाग कन्या एवं मानव कन्याओं (जिनकी संख्या षोडश सहस्र है) से