भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५५ विवाह कर लिया, फिर भी हे राधिके ! तुम्हारे समान किसीको भी न देखकर दन्तवक्र वधके पश्चात् पुनः ब्रजमें लौट आये हैं।” पद्मपुराणमें श्रीकृष्णके सुदीर्घ प्रवासके पश्चात् ब्रज आगमनका संवाद मिलता है— कृष्णोऽपि तं दन्तवक्रं हत्वा यमुनामुत्तीर्य नन्दव्रजं गत्वा सोत्कण्ठौ पितरौ अभिवाद्याश्वास्य ताभ्यां साश्रुकण्ठमालिङ्गितः सकल गोपवृन्दान् प्रणम्याश्वास्य सर्वान् सन्तर्पयामास ॥ अर्थात् श्रीकृष्ण दन्तव क्रका वध करनेके पश्चात् यमुना पार करके नन्दव्रजमें पहुँचे। वहाँ चिरोत्कण्ठित नन्द-यशोदाको प्रणाम आदि द्वारा आश्वासन दिया। उन दोनोंने आँसुओंसे स्नान कराते हुए श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर चिर व्यथाको प्रशमित किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने समस्त गोपवृन्दसे मिलकर उनके विरह दुख:को शान्त करके चिर-विरहिणी व्रजगोपियोंसे मिलकर उनकी तीव्र विरह पीड़ाको भी शान्त किया। श्रीमद्भागवतके प्रथम स्कन्धमें द्वारकावासी कह रहे हैं— यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान् कुरून्मधून् वाथ सुहृद्दिदृक्षया। तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद् रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत ॥ “हे कमलनयन ! जब आप सुहृद्जनोंके दर्शनके निमित्त कुरुदेश तथा मधुपुरीमें (व्रजमण्डलमें) गमन करते हैं, उस समय आपके विरहमें क्षणकाल भी कोटि युगके समान प्रतीत होता है। जैसे सूर्यके बिना आँखोंमें अन्धकार प्रतीत होता है वैसे ही आपके बिना चारों ओर शून्य प्रतीत होता है।” वसन्तमें गोपियोंका प्रियमिलन-जनित आनन्द तथा विरहीजनोंका प्रिय-विच्छेदजनित विरह दोनों ही मर्मस्पर्शी प्रसङ्ग हैं। इन्हीं बातोंका स्मरण कराती हुई सखी कहती है। प्रस्तुत पदमें शिखरिणी छन्द है, वैदर्भी रीति तथा उप नागरिका वृत्ति है।