भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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५६ श्रीगीतगोविन्दम् गीतम् ॥३॥ वसन्त-राग यति-तालाभ्यां गीयते (सरस वसन्त समय) यह तीसरा प्रबन्ध वसन्तराग तथा यति-तालसे गाया जाता है। वसन्त रागका स्वरूप है— शिखण्ड-बर्होच्चय-बद्धचूडः पुष्णन् पिकं चूत-नवांकुरेण। भ्रमन् मुदा-राममनङ्ग मूर्त्तिमर्त्तोमातङ्गो हि वसन्तरागः॥ अर्थात् वसन्तरागयुक्त पुरुषका सिर मयूरपिच्छसे बँधा होता है। आम्रमञ्जरी तथा लताओंसे वह श्रेष्ठ कोयल समूहको परिपुष्ट बनाता रहता है। सशरीर कामदेवके समान वह प्रसन्न मदमत्त गजराजके समान भ्रमण करता है॥ ललित-लवङ्गलता-परिशीलन-कोमल-मलय-समीरे मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज-कुटीरे। विहरति हरिरिह सरस-वसन्ते.... नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहि-जनस्य दुरन्ते ॥१॥ध्रुवम् उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधू-जन-जनित-विलापे । अलिकुल-संकुल-कुसुम-समूह-निराकुल-वकुल-कलापे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥२॥ मृगमद-सौरभ-रभसवशम्बद नवदलमाल-तमाले। युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज-नखरुचि-किंशुकजाले— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥३॥ मदन-महीपति-कनक-दण्डरुचि-केशर-कुसुम-विकासे। मिलित-शिलीमुख-पाटल-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥४॥

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