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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

५२ श्रीगीतगोविन्दम् (वासन्तीपुष्पैरिव सुकुमारैः यूथिकाकुसुमपेलवैरित्यर्थः) अवयवैः (अङ्गै रुपलक्षितमित्यर्थः) कान्तारे (निविडे वने) भ्रमन्तीं बहु-विहित-कृष्णानुसरणम् (बहु यथातथा विहितं कृतं कृष्णानुसरणं यया ताम्) [अतएव] अमन्दं (नितान्तं) कन्दर्पज्वरजनितचिन्ताकुलतया (कामसन्तापजनिता या चिन्ता उत्कण्ठा तया आकुलतया कातरतया) बलद्वाधां (परिवर्द्धमान- मदनपीडां) राधाम् इदं (वक्ष्यमाणं) सरसं (रसवत्) वचः ऊचे ॥ अनुवाद—किसी समय वसन्त ऋतुकी सुमधुर बेलामें विरह-वेदनासे अत्यन्त कातर होकर राधिका एक विपिनसे दूसरे विपिनमें श्रीकृष्णका अन्वेषण करने लगी, माधवी लताके पुष्पोंके समान उनके सुकुमार अङ्ग अति क्लान्त हो गये, वे कन्दर्पपीडाजनित चिन्ताके कारण अत्यन्त विकल हो उठीं, तभी कोई एक सखी उनको अनुरागभरी बातोंसे सम्बोधित करती हुई इस प्रकार कहने लगी ॥१॥ पद्यानुवाद— कौन वह दुर्गम वनोंमें, त्रस्त-मातल डोलती है? फूल वासन्ती शरीरी, कृष्णका मन तोलती है? देखकर कन्दर्प ज्वरसे, क्रान्त; मनको खोलती है। एक सहचरी हो सदय यह, राधिकासे बोलती है— बालबोधिनी—प्रस्तुत पद्यमें महाकवि श्रीजयदेवजीने सर्वप्रथम श्रीराधामाधवके मङ्गलमय मधुर मिलनके द्वारा उनके महा उत्कर्षका वर्णन किया है। इसी उपक्रममें श्रीराधामाधवकी रहःकेलिका वर्णन करनेसे कविका हृदय विकसित कमलकी भाँति आनन्दमें उछलित होने लगा है। इसलिए रसिक कविने दक्षिण, धृष्ट एवं शठ नायकके गुणोंसे विभूषित श्रीकृष्णको श्रीराधिकाके प्रति अनुकूल नायकके रूपमें प्रकट किया है। श्रीशुकदेवजीने जैसे 'सूची कटाह' न्यायसे अर्थात् स्वल्प परिश्रम-साध्य कार्यका सम्पादनकर पीछे बहु-परिश्रम-साध्य

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५३ कार्यको सम्पन्न करनेकी भाँति समस्त गोपियोंकी पहले श्रेष्ठता दिखलाकर अन्तमें श्रीराधाजीकी सर्वश्रेष्ठता प्रतिपादित की है। उसी प्रकार कविने श्रीराधामें आठ प्रकारके नायिका-लक्षणोंका वर्णन करते हुए श्रीराधाजीको सर्वनायिका- शिरोमणि सिद्ध किया है। [आठ प्रकारकी नायिका जैसे-१. अभिसारिका २. वासकसज्जा ३. उत्कण्ठिता ४. खण्डिता ५. विप्रलब्धा ६. कलहान्तरिता ७. प्रेषित-भर्त्तृका ८. स्वाधीन भर्त्तृका] प्रस्तुत श्लोकमें सम्भोग रसके पुष्टिकारक विप्रलम्भ शृङ्गारका वर्णन करते हुए विरहोत्कण्ठिता नायिका राधिकाका वर्णन कर रहे हैं। उद्दाम, मन्मथभावसे पीड़ित, महाज्वरग्रस्त, कम्पिताङ्गी, रोमाञ्चित, मलिनवपुमयी, पुनःपुनः मोहको प्राप्त होनेवाली वेपथुयुक्ता, सघनरूपसे पुलकित और उत्कण्ठिता होकर बोलनेवाली उत्कण्ठिता नायिकाके लक्षण भरतमुनिने नाट्यशास्त्रमें बताये हैं। शृङ्गार तिलक (१-७५) में विरहोत्कण्ठिता नायिकाके निम्नाङ्कित लक्षण बताये गये हैं— उत्का भवति सा यस्याः सङ्केतं नागतः प्रियः। तस्याऽनागमने हेतुं चिन्तयत्याकुला यथा॥ अर्थात् जिस नायिकाका नायक सङ्केतकालमें सङ्केत स्थानपर नहीं आता है, वह विरहोत्कण्ठिता नायिका कहलाती है, वह अपने प्रियतमके नहीं आनेके कारण सोच समझकर व्याकुल हो जाती है। यह श्लोक विप्रलम्भ शृङ्गार वर्णनकी भूमिका स्वरूप है। कवि कह रहे हैं कि वासन्तिक कालमें कोई एक सखी राधिकाजी से कहने लगी—“हे राधे! तुम्हारा शरीर माधवी पुष्पोंके समान अतिशय सुकोमल है और तुम यहाँ कण्टक कुशयुक्त, बीहड़ वनमें कान्त श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिए भ्रमण कर रही हो, इतना अन्वेषण करनेपर भी तुम्हें प्रियतम नहीं मिले। कन्दर्प-वाणसे पीड़ित, अति तीव्र कामज्वरसे सन्तप्त तुम उन्हें पानेकी लालसामें व्याकुल हो रही हो।”

५४ श्रीगीतगोविन्दम् प्रस्तुतपद्यमें 'वसन्त' पदके द्वारा कालरूपी उद्दीपन विभावको बतलाया है। 'चलद्'—यह पद श्रीराधाजीका विशेषण है, इससे सूचित होता है कि उन्होंने श्रीकृष्णको काननमें बार-बार अन्वेषण किया कि प्रियतम शायद अब आयें, अब आयें। 'वासन्ती सुकुमारयवै'—उन श्रीराधाजीके अङ्ग सुकुमार हैं। वासन्ती कुसुम अर्थात् माधवी लता। वसन्त ऋतुमें यह लता पूर्णतया विकसित हो जाती है, वासन्ती लताके पुष्प अत्यन्त मनोज्ञ तथा सुकुमार होते हैं, उसी प्रकार श्रीराधाजीके अङ्ग अत्यन्त मनोहर तथा सुकुमार हैं—यह इस पदके द्वारा सूचित होता है। “हे सखी राधे! यह निश्चित है कि तुम्हारे प्राणनाथ श्रीकृष्ण तुम्हें छोड़कर किसी दूसरीके साथ विहार कर रहे हैं, शारदीया रास-रजनीमें प्रथम महोत्सवमें श्रीकृष्णने तुम्हारे असमोर्द्ध रूप-गुण माधुरीका अनुभव कर लिया था। तुम्हारे प्रति सर्वविदित अनुरागको वे सार्थक मानने लगे थे। अतः कदाचित् तुम्हारी सरीखी कोई इस व्रजमण्डलमें है या नहीं, यह जाननेके लिए पत्थरकी खुदाईकी क्रियाकी भाँति उसे ढूँढ़ते हुए कुछ दिनोंके लिए इधर उधर निकल गये हैं। अथवा तुम्हारे सदृश कोई है या नहीं यह जाननेकी इच्छासे श्रीकृष्णके अभिप्रायके अनुसार योगमायाने कंसको प्रेरणा दी और कंसने अक्रूरको नन्दगाँव भेजा, श्रीकृष्णने अक्रूरके साथ नारी संकुला बहुसंख्यक स्त्रियोंके सङ्गसे परिवेष्टित मथुरापुरीमें प्रस्थान किया। श्रीकृष्णने देखा, मथुरा मण्डलमें व्रजसुन्दिरियों जैसा सौन्दर्य किसीका नहीं और न ही उनके जैसा गुणाकर्षण है। तब इस चाहमें वे मानो द्वारकाके लिए प्रस्थान कर गये। द्वारकामें तब श्रीकृष्णने नरेन्द्र कन्याओंके साथ विवाह किया, वहाँ भी सफलता न मिलने पर नरकासुर द्वारा अपहृत गन्धर्व कन्या, यक्ष कन्या, नाग कन्या एवं मानव कन्याओं (जिनकी संख्या षोडश सहस्र है) से

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५५ विवाह कर लिया, फिर भी हे राधिके ! तुम्हारे समान किसीको भी न देखकर दन्तवक्र वधके पश्चात् पुनः ब्रजमें लौट आये हैं।” पद्मपुराणमें श्रीकृष्णके सुदीर्घ प्रवासके पश्चात् ब्रज आगमनका संवाद मिलता है— कृष्णोऽपि तं दन्तवक्रं हत्वा यमुनामुत्तीर्य नन्दव्रजं गत्वा सोत्कण्ठौ पितरौ अभिवाद्याश्वास्य ताभ्यां साश्रुकण्ठमालिङ्गितः सकल गोपवृन्दान् प्रणम्याश्वास्य सर्वान् सन्तर्पयामास ॥ अर्थात् श्रीकृष्ण दन्तव क्रका वध करनेके पश्चात् यमुना पार करके नन्दव्रजमें पहुँचे। वहाँ चिरोत्कण्ठित नन्द-यशोदाको प्रणाम आदि द्वारा आश्वासन दिया। उन दोनोंने आँसुओंसे स्नान कराते हुए श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर चिर व्यथाको प्रशमित किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने समस्त गोपवृन्दसे मिलकर उनके विरह दुख:को शान्त करके चिर-विरहिणी व्रजगोपियोंसे मिलकर उनकी तीव्र विरह पीड़ाको भी शान्त किया। श्रीमद्भागवतके प्रथम स्कन्धमें द्वारकावासी कह रहे हैं— यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान् कुरून्मधून् वाथ सुहृद्दिदृक्षया। तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद् रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत ॥ “हे कमलनयन ! जब आप सुहृद्जनोंके दर्शनके निमित्त कुरुदेश तथा मधुपुरीमें (व्रजमण्डलमें) गमन करते हैं, उस समय आपके विरहमें क्षणकाल भी कोटि युगके समान प्रतीत होता है। जैसे सूर्यके बिना आँखोंमें अन्धकार प्रतीत होता है वैसे ही आपके बिना चारों ओर शून्य प्रतीत होता है।” वसन्तमें गोपियोंका प्रियमिलन-जनित आनन्द तथा विरहीजनोंका प्रिय-विच्छेदजनित विरह दोनों ही मर्मस्पर्शी प्रसङ्ग हैं। इन्हीं बातोंका स्मरण कराती हुई सखी कहती है। प्रस्तुत पदमें शिखरिणी छन्द है, वैदर्भी रीति तथा उप नागरिका वृत्ति है।

५६ श्रीगीतगोविन्दम् गीतम् ॥३॥ वसन्त-राग यति-तालाभ्यां गीयते (सरस वसन्त समय) यह तीसरा प्रबन्ध वसन्तराग तथा यति-तालसे गाया जाता है। वसन्त रागका स्वरूप है— शिखण्ड-बर्होच्चय-बद्धचूडः पुष्णन् पिकं चूत-नवांकुरेण। भ्रमन् मुदा-राममनङ्ग मूर्त्तिमर्त्तोमातङ्गो हि वसन्तरागः॥ अर्थात् वसन्तरागयुक्त पुरुषका सिर मयूरपिच्छसे बँधा होता है। आम्रमञ्जरी तथा लताओंसे वह श्रेष्ठ कोयल समूहको परिपुष्ट बनाता रहता है। सशरीर कामदेवके समान वह प्रसन्न मदमत्त गजराजके समान भ्रमण करता है॥ ललित-लवङ्गलता-परिशीलन-कोमल-मलय-समीरे मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज-कुटीरे। विहरति हरिरिह सरस-वसन्ते.... नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहि-जनस्य दुरन्ते ॥१॥ध्रुवम् उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधू-जन-जनित-विलापे । अलिकुल-संकुल-कुसुम-समूह-निराकुल-वकुल-कलापे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥२॥ मृगमद-सौरभ-रभसवशम्बद नवदलमाल-तमाले। युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज-नखरुचि-किंशुकजाले— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥३॥ मदन-महीपति-कनक-दण्डरुचि-केशर-कुसुम-विकासे। मिलित-शिलीमुख-पाटल-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥४॥

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५७ विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे। विरही-निकृन्तन-कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥५ ॥ माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ। मुनि-मनसामपि मोहन-कारिणि तरुणाकारणबन्धौ— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥६ ॥ स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित चूते। वृन्दावन-विपिने परिसर-परिगत-यमुनाजलपूते— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥७ ॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमुदयतु हरिचरणस्मृतिसारं । सरस-वसन्त-समय वनवर्णनमनुगत मदन-विकारम्— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥८ ॥ अब यहाँ नीचे प्रत्येक पद्य, पद्यका अन्वय, श्लोकानुवाद, पद्यानुवाद तथा बालबोधिनी व्याख्या दी जा रही है— ललित-लवङ्गलता-परिशीलन-कोमल-मलय-समीरे मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज कुटीरे— विहरति हरिरिह सरस-वसन्ते नृत्यति युवतिजनेन समं सखि विरहि-जनस्य दुरन्ते ॥१॥ध्रुवम् अन्वय—अयि सखि, ललित-लवङ्गलता-परिशीलन-कोमल- मलय-समीरे ललितानां मनोहराणां लवङ्गलतानां परिशीलनेन संसर्गेण कोमलः मृदुः सुरभिश्च मलयसमीरः मलयवायुः येन तादृशे; लतानारी-संस्पर्शात् कोमलत्वेन मान्द्यं, पुष्पसम्बन्धात् सौगन्ध्यं, यमुनाजलसम्बन्धात् शैत्यम्, अचेतनापि लता कान्तमन्तरेण चेत् स्थातुं न शक्नोति तर्हि चेतनानां का कथेति भावः); मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-

५८ श्रीगीतगोविन्दम् कुञ्जकुटीरे (मधुकराणां भ्रमराणां निकरैः समूहैः करम्बिताः मिश्रिताः ये कोकिलाः तैः कूजितं मुखरितं कुञ्जकुटीरं यत्र तथाभूते); [तथा] विरहि-जनस्य दुरन्ते (निपीड़के) [सरसोऽपि वसन्तोऽयं विरहिणां दुःखदत्वात् दुरन्त इत्यर्थः]; इह सरस-वसन्ते (रसमये वसन्ते) [रसोऽत्र शृङ्गारः]; हरिः (मनोहरणशीलः अतोऽस्य विरहो दुःसहः) युवति-जनेन (कयाचित् तरुण्या) समं (सह) विहरति (क्रीडति) नृत्यति च॥१॥ अनुवाद—प्रिय सखि! राधे! हाय! यह वसन्तकाल विरही जनोंके लिए अतीव दुःखदायी है। देखो न! इसके आगमनपर मलय समीर सुकोमल मनोज्ञ लताओंको पुनः-पुनः आदरके साथ आलिङ्गनकर कैसी मनोहर शोभा प्रकट कर रहा है। देखो! कुञ्ज-कुटीरमें भ्रमरोंके मँडरानेसे उत्पन्न गुञ्जारसे तथा कोयलोंकी सुमधुर कुहुध्वनिसे दिग्दिगन्त परिपूरित हो गये हैं और वे श्रीकृष्ण इस कुञ्ज कुटीरमें किसी भाग्यवती युवतीके साथ विहार कर रहे हैं और प्रेमोत्सवमें मग्न होकर नृत्य भी कर रहे हैं। पद्यानुवाद— ललित लवङ्गलता परिचुम्बित कोमल मलय समीर मधुकर-निकर कलित कोकिलसे कुजित कुंज-कुटीर लहर उठता रमणीका चीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥१॥ बालबोधिनी—जब मलय समीरके सम्पर्कसे वृक्षावलियोंमें नवजीवनका सञ्चार होने लगता है, बेली, चमेली आदि पुष्पोंके खिलनेसे भौंरे गुञ्जार करने लगते हैं, आम्रके मुकुलित होनेसे कोयलें कूजन करने लगती हैं और वे कन्दर्प-मत्त-मातङ्गके समान मोरपंखकी पगड़ी धारणकर सबके मनको विमोहित करते हैं। वसन्तके समयमें वसन्त-राग होता है। यति-तालमें लघु और द्रुतकी त्रिपुटी रहती है। सखी-इस पदसे सुहृदत्व सूचित हो रहा है।

प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ५९ सरसवसन्ते-सरस विशेषणके द्वारा वसन्त ऋतुकी रसमयता और आस्वाद्यता सूचित की गई है। विरहि जनस्य दुरन्ते-विरहीजन इस सरस वसन्तमें बड़े दुःखके साथ अपने समयको बिताते हैं। श्रीहरि अपने मधुर लीलाओंके द्वारा सबके चित्त, मन और प्राणोंका हरण कर लेते हैं और फिर उनका विरह अतिशय कष्टदायी और असहनीय होता है। ललित लवङ्गलता परिशीलन कोमल मलय समीरे-श्रीकृष्ण जहाँ विराजमान हैं, उस स्थानकी विशेषता बतलाते हुए कहते हैं कि मनोहर लवङ्गलताओंके संस्पर्शसे यहाँकी मलय वायु मृदुल बन गयी है, यों तो मलय समीर शीतल, मन्द और सुगन्धित होता है, किन्तु लवङ्ग-लताओंके संस्पर्शसे वह और भी कोमल और सुगन्धित बन गया है। मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज-कुटीरे-इस पदका विग्रह है-मधुकराणां यो हि निकर स्तेन करम्बिताः मिश्रिताः ये कोकिला स्तैः कूजितः यः कुञ्ज कुटीरः तत्र। अर्थात् नृत्य स्थान अमर समुदाय एवं कोकिला समूहसे कूजित कुञ्जकी कुटीर है। इस प्रकार किसी सहचरीके द्वारा विरह उत्कण्ठिता श्रीराधाके समीप वसन्तकालीन वृन्दावनकी शोभाका वर्णन किया गया है। मनोहर लवङ्ग-लताके द्वारा वृक्षका आलिङ्गन किये जानेसे, मलय पवनके संस्पर्शसे, पुष्पोंकी सुगन्धसे, यमुना जलकी शीतलतासे, लताओंकी कमनीयतासे, नारियोंके सुकोमल अङ्गके स्पर्शसे यह वसन्त, कान्तके मिलनमें जितना सुखदायी होता है, विरहमें उतना ही दुःखदायी भी होता है। जब वसन्त विलास होनेसे अचेतन लता भी कान्तके बिना नहीं रह सकती, तब चेतनस्वरूपा स्त्रीलता कान्तके बिना कैसे रह सकती है? इसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन,

६० श्रीगीतगोविन्दम् कोयलोंका कूजन और भी हृदय विदारक हो जाता है। जब माधवी और बेली पुष्पोंके सौरभसे मुनियोंका मन भी आकर्षित हो जाता है, तब कामी-कामिनियोंकी तो बात ही क्या ? पुनः माधवकी स्फूर्ति प्राप्त होनेपर सखी कहती है—माधवी-लता जब आम्र वृक्षका आलिङ्गन करती है, तो मञ्जरियाँ पुलकित हो उठती हैं। जैसे किसी वर सुन्दरीके द्वारा किसी पुरुषको आलिङ्गन किये जानेसे वह पुलकित हो जाता है, वैसे ही आज श्रीहरि यमुना जलसे व्याप्त वृन्दाविपिनमें वसन्तकालकी शोभासे मुग्ध होकर युवतियों द्वारा आलिङ्गन परायण होकर विहार कर रहे हैं। इस श्लोकमें शृङ्गारके उद्दीपन विभागोंका वर्णन है। इन विभागोंसे विप्रलम्भ-शृङ्गारकी पुष्टि होती है ॥१॥ उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधूजन-जनित-विलापे । अलिकुल-संकुल-कुसुम-समूह-निराकुल-बकुल-कलापे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥२॥ अन्वय—उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधूजन-जनित-विलापे (उद्गतो मदो यस्य तेन गर्वस्फीतेन मदनेन मनोरथो येषां तेषां पथिकवधूजनानां जनितो विलापो येन तस्मिन्) [तथा] अलिकुल-सङ्कुल-कुसुम-समूह-निराकुल-बकुल-कलापे (अलि- कुलेन भ्रमरनिकरेण सङ्कुलः आकीर्णो यः कुसुम-समूहः तेन निराकुलः नितरामाकुलः व्याप्तः इति यावत् वकुलकलापः यस्मिन् तादृशे) [सरस वसन्ते इत्यादि] ॥२॥ अनुवाद—प्रिय सखि ! प्रवासमें गये हुए पतियोंके विरहका अनुभवकर विरहिणियाँ केवल विलाप करती रहती हैं। तुम देखो तो ! इस वसन्त ऋतुमें मालती वृक्षोंमें पुष्पोंको समा लेनेके लिए कोई रिक्त स्थान ही नहीं है। राशि-राशि बकुल

प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६१ पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं और इनपर श्रेणीबद्ध होकर असंख्य भ्रमर गुञ्जार कर रहे हैं और उधर श्रीकृष्ण युवतियोंके साथ विहार तथा नृत्य कर रहे हैं। हाय ! कैसे धैर्य धारण करूँ ॥२॥ पद्यानुवाद- काम-पीड़िता पांथ-वधू का व्यापित बहुल विलाप, अलिकुल संकुल सुमन मनोहर पादप बकुल कलाप। नहीं धरते हैं विरही धीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥२॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत श्लोकमें वसन्तकी दुरन्तता और उन्मादकताका चित्रण करते हुए सखी श्रीराधारानीसे कहती है कि यह समय विरहीजनोंके लिए अति दुष्कर है, इस समय मद तथा काम आविर्भूत हो जाते हैं। प्रियतमके द्वारा प्रवास हेतु चले जानेपर नानाप्रकारके मनोरथोंके द्वारा प्रचालित होकर नायिकाएँ विरह विलाप करती रहती हैं। चहुँदिशि मौलश्री आदि कुसुमसमूहके द्वारा सुगन्ध विकीर्ण करनेपर आमोदित भ्रमरकुल जैसे विकल होकर गुञ्जन करते हैं ॥२॥ मृगमद-सौरभ-रभसवशंवद नवदलमाल-तमाले। युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज-नखरुचि-किंशुकजाले- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥३॥ अन्वय-मृगमद-सौरभ-रभस-वशंवद-नव-दलमाल-तमाले (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः यः सौरभ-रभसः सौरभ-वेगः सौगन्ध्यातिशय इति यावत् तस्य वशंवदा वशवर्त्तिनी अनुकारिणीति भावः, नव-दल-माला किशलयसमूहः येषु तादृशः, तमालाः यस्मिन् तथा-भूते); [तथा] युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज- नखरुचि-किंशुक-जाले (युवजनानां तरुणानां हृदय-विदारणाः हृदयभेदकराः मनसिजस्य मदनस्य ये नखाः तेषां रुचिः

६२ श्रीगीतगोविन्दम् शोभाइव रुचिः शोभा येषां तथाभूतानां किंशुकानां पलाश-कुसुमानां जालं समूहः यस्मिन् तादृशे) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥३॥ अनुवाद—तमाल वृक्षावली नूतन पल्लवोंसे विभूषित हो मानो कस्तूरीकी भाँति चारों ओर सौरभका विस्तार कर आमोदित हो रही है। देखो, देखो सखी ! इन प्रफुल्लित ढाक (पलाश) के पुष्पोंकी कान्ति कामदेवके नखके समान दिखायी दे रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मदनराजाने मानो युवक युवतियोंके वक्षस्थलको विदीर्ण कर दिया है॥३॥ पद्यानुवाद— मृगमद-सौरभ सम विस्तारित परिमल मधुर तमाल; युवजन मन-बेधक मनसिज-कर नखरुचि किंशुक जाल। हृदयमें उठती रह रह पीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—समस्त दिशाओंमें तमाल वृक्षके नवीन पल्लव सुशोभित हो रहे हैं और उनकी सुगन्ध कस्तुरीके समान चतुर्दिशि व्याप्त हो रही है। प्रस्फुटित पलाश कुसुम- समूहको देखकर लगता है कि वे मानो विरही युवक युवतियोंके हृदयको विदीर्ण करनेके साधनभूत मदनदेवके नखरे-नख रूपी आयुध विशेष हैं। अर्थात् श्रीमाधवका अङ्गसौरभ चारों ओर आमोदित हो रहा है, परन्तु उनका विरह अति असहनीय हो गया है। उनके विरहमें युवतियोंका हृदय विदीर्ण हो गया है। यह बड़ा ही कठोर है। मदन-महीपति-कनक-दण्डरुचि-केशर-कुसुम-विकासे। मिलित-शिलीमुख-पाटल-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥४॥ अन्वय—मदन-महीपति-कनक-दण्ड-रुचि-केशर-कुसुम विकाशे (मदनमहीपतेः मदन-राजस्य यः कनकदण्डः स्वर्णमययष्टिः तस्य रुचिरिव रुचैर्यस्य तादृशः केसर-कुसुमानां

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६३ नागकेसरपुष्पाणां विकासो यस्मिन् तथोक्ते); [तथा] मिलित- शिलीमुख-पाटलि-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे (मिलिताः समवेताः शिलीमुखाः भ्रमराः येषु तादृशैः पाटलिपटलैः पाटलाकुसुमनिकरैः कृतः सम्पादितः स्मरस्य कामस्य यः तूणस्तस्य विलासः चेष्टितं यस्मिन् तादृशे; पाटलिः पारुलफुल इति भाषा; पाटलिपुष्पस्य तूणाकारत्वात् शिलीमुखशब्दस्य च श्लिष्टत्वात् साम्यं) [सरसवसन्ते इत्यादि] ॥४॥ अनुवाद—अब वनके विकसित पुष्प-समुदाय ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो मदनराजके हेमदण्ड हैं और भ्रमरावलिसे परिवेष्टित पाटलि (नागकेशर) पुष्पसमूह ऐसे दिखायी दे रहे हैं, मानो कामदेवके तूणीर हों। पद्यानुवाद— मदनराजके कनक-दण्ड-सा केसर-कुसुम-विकास, पाटल पर भौरोंकी छविका अङ्कित मधुर विलास। जुड़ी है मधु-रसिकोंकी भीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—सखि ! मदन-महीपतिके सुवर्ण छत्रकी विशिष्ट कान्तिके समान नागकेशर पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं। उसमें भी भ्रमरावलीके तीक्ष्ण दन्तरूपी वाणोंसे बिद्ध यह वसन्तकाल विरहीजनोंके हृदयको भेद रहा है ॥४॥ विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे । विरही-निकृन्तन-कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥५॥ अन्वय—विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे (विगलितं दूरं गतं लज्जितं लज्जा येषां [वसन्तस्य निरतिशयोद्दीपकत्वात् त्यक्तलज्जानामिति भावः] तादृशानां जगतां जगद्वासिनाम् अवलोकनेन दर्शनेन तरुणैः नवविकसित- पुष्पैरित्यर्थः करुणैः तदाख्यवृक्षैः [करुणानेवु इति भाषा] कृतः पुष्पविकाशरूप-हासः यत्र तादृशे); यूनामेव कामाभिज्ञतया

६४ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ श्रीगीतगोविन्दम् हास्यस्योपयुक्तत्वे श्लिष्टार्थस्य तरुणशब्दस्योपादानम्) [तथा] विरहि-निकृन्तन कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे (विरहिणां वियोगिनां निकृन्तनाः संहारकाः ये कुन्ताः अस्त्रविशेषाः तेषां मुखानामाकृतिरिव आकृति-येषां तादृशैः केतकिभिः तन्नामक-कुसुमविशेषैः (केयाफुल इति भाषा) दन्तुरिताः कृतदन्तविकाशाः परिव्याप्ता इति यावत् आशाः दिशः यत्र तादृशे) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अरी सखि ! वसन्तके प्रतापसे ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण जगत निर्लज्ज हो गया है। यह देखकर तरुण करुण पादपसमूह (वृक्षराजि) प्रफुल्लित सुमनोंके व्याजसे हँस रहे हैं। देखो, विरहीजनोंके हृदयको विदीर्ण करनेके लिए बरछीकी नोकके समान आकारवाले केतकी (केवड़ा) प्रसून चहुँदिशि प्रफुल्लित विलसित विकसित हो रहे हैं। इनके संयोगसे दिशाएँ भी प्रसन्न हो रही हैं। पद्यानुवाद— लज्जा गलित विश्वका करता तरुण करुण उपहास, बिद्ध केतकी कुन्तमुखोंसे विरही मन-आवास। हार जाते हैं पलमें वीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है—प्यारी सखि ! और क्या कहूँ, इस वसन्तकालमें जगतके विरहीजन लाजका त्यागकर प्रियतमके विरहमें रोदन कर रहे हैं। सम्पूर्ण जगतमें प्राणीमात्रकी ही लज्जा पूर्णरूपेण समाप्त हो गयी है। जगतकी इस दशाका अवलोकन करके तरुण करुण विटपावली खिले एवं द्युतिमान पुष्पोंके बहानेसे हास्यसुधा बिखेर रही हैं। अथवा विलासिनी स्त्रियोंके हृदयकी कामवासनाको जानकर नवतरुण पुरुष हास्यामृतको प्रकाशित कर रहा है। करुणा और हास्य दोनों किस प्रकार सम्भव है?

प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६५ करुणा इसलिए कि कण्ठाश्लेष प्रणयीजनोंके वियोगमें इनकी बड़ी दीन दशा होती है और हास्यका कारण है, विरहीजनोंकी अधीरता। खिले केतकी पुष्पोंके अग्रभागको देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे विरहियोंके हृदयका विदारण करने हेतु बरछी हों। माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ। मुनि-मनसामपि मोहन-कारिणि तरुणाकारणबन्धौ- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥६॥ अन्वय-माधविका-परिमल-ललिते (माधविकायाः परिमलेन आमोदेन ललिते मनोहरे) [तथा] नवमालिकया (नवमालिका- कुसुमेन) अतिसुगन्धौ (अतिसुरभित) [अतएव] मुनि-मनसामपि (तापस-चित्तानामपि; का वार्त्ता कामिनाम् इत्यपेरर्थः) मोहन-कारिण (मोहकरे) [तथाच] तरुणाकारणवन्धौ (एकशेषस्तरुणशब्दः; तरुणानां तरुणीनाञ्चेत्यर्थः; अकारणवन्धौ अकृत्रिमसुहृदि; हेतुं विनापि हितकारिणीत्यर्थः) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥६॥ अनुवाद-यह वसन्त मास वासन्ती पुष्पोंके मकरन्दसे अतिशय ललित एवं मनोहर हो रहा है तथा नवमालिका (जूही) पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित हो रहा है। इसकालमें तो मुनियोंके मनमें भी विकार उत्पन्न हो जाता है, वे मुग्ध हो उठते हैं। यह वसन्त युवावर्गका अकारण बन्धु है॥ पद्यानुवाद- माधविका-मालती-गन्ध अब रही दिशामें व्याप। मोहित मुनि-मन विकल तरुण जन खिंचते अपने आप॥ दिखाये कैसे हियको चीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी-माधवी लताके पुष्पोंके परागसे यह वसन्त ऋतु मनोहर हो गया है और वातावरण नवमालिका (जूही) की सुगन्धसे सुवासित हो गया है। यह सुवासितता मुनिजनोंके

६६ श्रीगीतगोविन्दम् मनमें कामविकारको उत्पन्न करा देती है; फिर साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या की जाय? जब ऐसा वसन्त समय होता है, तब अचेतन लता कान्त (वृक्ष) के बिना नहीं रह सकती है, तो चेतनस्वरूपा हम जैसी स्त्री-लताएँ कान्तके बिना कैसे रह सकती हैं? उसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन, कोयलोंका कूजन और भी हृदयविदारक हो जाता है। ऐसी स्थितिमें वह वसन्त तरुण-तरुणियोंका अकारण बन्धु है॥६॥ स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित चूते। वृन्दावन-विपिने परिसर-परिगत-यमुनाजलपूते— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥७॥ अन्वय—स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित-चूते (स्फूरन्तीनां आकम्पितानाम् अतिमुक्तलतानां माधवीलतानां परिरम्भणेन आलिङ्गनेन पुलकिताः जातरोमाञ्चाः इव मुकुलिताः ईषद्विकसितमुकुलाः चूताः रसालाः यत्र तादृशे) [यथा कश्चित् वराङ्गनालिङ्गितः जातरोमाञ्चो भवति तथेति भावः]; [तथा] परिसर-परिगत-यमुना-जलपूते (परिसरेषु पर्यन्तभूमिषु प्रान्तेषु इत्यर्थः परिगता प्राप्ता या यमुना तस्याः जलैः पूते पवित्रीकृते सुशोभिते इति तात्पर्यार्थः) वृन्दावन-विपिने (वृन्दावन-कानने) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥७॥ अनुवाद—हे सखि! चपल मुक्तालताके आलिङ्गनसे युक्त मुकुलित (मञ्जरियोंसे पूर्ण) तथा रोमाञ्चित आम्रवृक्षोंसे युक्त वृन्दाविपिनके सन्निकट प्रवाहमाना यमुनाके पावन जलमें श्रीहरि युवतियोंके साथ परस्पर मिलित होकर विहार कर रहे हैं॥७॥ पद्यानुवाद— वायु चञ्चलित लता माधवीसे आलिङ्गित आम, परिपुष्पित है; पूत जमुन-जलसे वृन्दावन-धाम॥

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६७ समाया उसमें सागर क्षीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—इस वासन्तिक कालमें चेतनके साथ जड़ पदार्थ भी कामसे विकृत देखे जा सकते हैं। समीरणके वश हुई अतिमुक्तालता (माधवीलता) ने जब आम्रवृक्षका आलिङ्गन किया तो वह मुकुलित और रोमाञ्चित हो गया। सन्निकटमें प्रवाहित होनेवाली यमुनाके जलसे पवित्र वृन्दाविपिनमें श्रीकृष्ण केलिक्रीड़ा कर रहे हैं ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमुदयतु हरिचरणस्मृतिसारं । सरस-वसन्त-समय वनवर्णनमनुगत मदन-विकारम्— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-भणितम् (जयदेवोक्तं) इदम् अनुगत- मदनविकारं (अनुगतं अनुसृतं मदनस्य कामस्य विकारो विक्रिया येन तत् कामादीपकमित्यर्थः) हरि-चरण-स्मृतिसारं (हरिचरणयोः स्मृतिः स्मरणमेव सारः परमार्थो यस्य तथाभूतं) सरस-वसन्तमय-वनवर्णनं (सरसः यः वसन्तसमयः तत्र वनवर्णनम्) उदयतु (भक्तहृदये वृद्धिं गच्छतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण-विरहजनित उत्कण्ठिता श्रीराधाके मदनविकारसे सम्बलित इस वसन्त समयकी वनशोभाका चित्रणरूप यह सरस मङ्गलगीत अति उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुआ है। यह वासन्तिक काल कामविकारोंसे अनुस्यूत है जो श्रीहरिके चरणकमलकी स्मृतिको उदित कराता है ॥८॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव काव्य केवल हरि-चरण-स्मृतिका सार, सरस वसन्त समय वन-वर्णन अनुगत मदन-विकार।

६८ श्रीगीतगोविन्दम् लहर उठता रमणीका चीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥८॥ बालबोधिनी—कवि श्रीजयदेव इस गीतका उपसंहार करते हुए इसके उत्कर्षका वर्णन करते हैं। इस मङ्गलगीतमें हरिचरण स्मृतिसाररूप शृङ्गार-रसके पोषक वसन्तकालके वनविहारका अभिव्यञ्जन है। इस गीतकी जय हो। जिसका मदनविकार हुआ है, ऐसे निकटवर्त्ती जन ही इसका श्रवण करें, जिससे उनके विकार दूर हो जायेंगे। यह मङ्गलगीत अष्टपदीय है, जिसमें जाति नामक अलङ्कार है। इसमें वर्णित श्रीराधा मध्या नायिका हैं। इसमें श्रीकृष्ण दक्षिण नायकके रूपमें हैं। इसमें शृङ्गार रसका विप्रलम्भ भाव है। इसमें प्रयुक्त छन्दका नाम लय है। इस तृतीय प्रबन्धका नाम "माधवोत्सव कमलाकर" है। दर-विदलित-मल्ली-वल्लि-चञ्चत्-पराग- प्रकटित-पटवासैर्वासयन् काननानि। इह हि दहति चेतः केतकी-गन्ध-बन्धुः प्रसरदसमबाण-प्राणवद्-गन्धबाहः ॥९॥ अन्वय—[अथ वसन्तवायु वर्णयति कवि:]—इह (वसन्ते) केतकीगन्धवन्धुः (केतकीनां गन्धस्य वन्धुः नित्यसहचरः अत्यागसहनइत्यर्थः) [तथा] प्रसरदसमवाण-प्राणवत् (प्रसरन् प्रतिदिशं सञ्चरन् तरुणचेतसि प्रवृद्धिं गच्छन् यः असमवाणः पञ्चवाणः मदन इत्यर्थः मदनोऽत्र नृपत्वेन निरूपितः तस्य प्राणवत् प्राणसदृशं अतिप्रिय इत्यर्थः; अस्य निरतिशय- मदनोद्दीपकत्वादिति भावः) गन्धवाहः (दक्षिणानिलः) [सख्युराज्ञा पालनीया इत्यालोच्य] दर-विदलितमल्ली-वल्लि- चञ्चत्पराग- प्रकटित-पट-वासैः (दर-विदलितानाम् ईषद्- विकसितानां मल्लीनां मल्लिकानां या वल्लयः लताः तासां चञ्चन्तः प्रसरन्तः ये परागाः पुष्परेणवः ते एव प्रकटिताः स्फुटीकृताः

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६९ पटवासाः सुगन्धचूर्णविशेषाः तैः) काननानि वासयन् (सुरभीकुर्वन्) चेतः [वियोगिनामिति शेषः] दहति हि (नितरां सन्तापयत्येव) ॥१॥ अनुवाद—हे सखि! देखो, अर्द्ध प्रस्फुटित मल्लिकालताके मकरन्दके श्वेतचूर्णसे वनस्थली श्वेत पटवास द्वारा समाच्छादित हो गयी है। केतकी कुसुमोंके सुगन्धसे मलयपवन आमोदित हो रहा है, यह पवन कामदेवके बाणके समान उसका प्राणसखा बन विरहीजनोंके हृदयको दग्ध कर रहा है॥१॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीके सम्मुख वसन्तकालमें प्रवहमाना मलयवायुकी उद्दीपनाका वर्णन करती हुई कह रही है कि पवन विरहीजनोंके हृदयको तापित कर रहा है। यदि यह पूछा जाय कि किस अपराधके कारण वायु चित्तको दग्ध कर रही है तो इसके उत्तरमें कहते हैं, यह पवन कामदेवका प्राणतुल्य है, अतः अपने सखाके आदेशका पालन करते हुए विरहीजनोंके हृदयको तपाने लगता है। इस वसन्तकालमें मल्लिका-लता ईषत् रूपसे विकसित हो गयी है, उसके उड्डीयमान परागपुञ्ज ही पटवास बन गये हैं और केतकी प्रसूनोंके इस परिमल-चूर्णसे वायु सुगन्धसे परिपूर्ण हो गयी है, कामदेवके समान यह पवन भी विरहीजनोंको सन्तप्त कर रहा है। अतएव यह समीरण कामदेवके प्राणके समान है। प्रस्तुत श्लोक मालिनी छन्दका है, समासोक्ति तथा वर्णानुप्रास अलङ्कारोंकी संसृष्टि है॥१॥ अद्योत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशादिवेशाचलं प्रालेय-प्लवनेच्छयानुसरति श्रीखण्डशैलानिलः। किञ्च स्निग्ध-रसाल-मौलि-मुकुलान्यालोक्य हर्षोदया- दुन्मीलन्ति कुहूः कुहूरिति कलोत्तालाः पिकानां गिरः ॥२॥ अन्वय—अद्य (अधुना) श्रीखण्डशैलानिलः (श्रीखण्डशैलस्य मलयाचलस्य अनिलः वायुः) उत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशात् इव (उत्सङ्गे क्रोड़े वसन्तः ये भूजङ्गाः सर्पाः तेषां कवलेन

७० श्रीगीतगोविन्दम् ग्रासेन यः क्लेशः तस्मात्); [भुजङ्गाः पवनाशनाः इति लोके प्रसिद्धमेव तस्य; भुजङ्गकवलेन विषव्याप्तदेहत्वादिति भावः] प्रालेय-प्लवनेच्छया (प्रालेयेषु हिमेषु प्लवनेच्छया अवगाहनाशया विषज्वालायाः शान्तये इति भावः) ईशाचलं (ईशस्य महादेवस्य अचलः पर्वतः हिमाचलस्तं) अनुसरति (गच्छति); [चन्दनतरु कोटरस्थ-विषधर-कवल-सन्तप्तोवायुः हिमस्नानेच्छया हिमाचलं यातीव; वसन्ते दक्षिणदिग्वर्त्तिनो मलयाचलात् वायेरुत्तरत्र गमनात् उत्तरे च हिमाचलस्य अवस्थानात् इयमुत्प्रेक्षा]। [किञ्च] स्निग्ध-रसाल-मौलिमुकुलानि (स्निग्धानि कोमलानि रसालानां चूततरूणां मौलिषु शिखरेषु यानि मुकुलानि तानि) आलोक्य (दृष्ट्वा) हर्षोदयात् (आनन्दोदयात्) पिकानां (कोकिलानां) कुहुः कुहूरिति कलोत्तालाः (कला अव्यक्तमधुरा उत्ताला अत्युच्चाः), गिरः (ध्वनयः) उन्मीलन्ति (उद्गच्छन्ति) ॥२॥ अनुवाद—अरी सखि! सुना है श्रीखण्डशैल (मलय पर्वत) में बहुतसे सर्प निवास करते हैं, वहाँका पवन भुजङ्गोंके विषसे निश्चित ही जर्जर हो गया है, इससे ऐसा लगता है कि वह उस विष ज्वालासे जलकर हिम सलिलमें स्नान करनेके लिए हिमालयकी ओर प्रवाहित होने लगा है। देखो! देखो! सखि! मधुर, मनोहर, स्निग्ध रसालमौलि मुकुलों (मञ्जरियों) को देखकर हर्षसे विभोर कोकिल कुहु-कुहुकी मधुर वाणीमें उच्चस्वरसे कूजन कर रही है। पद्यानुवाद— सतत सर्प पीड़ासे तापित, मलय पवन हिमदेश बहनेको आतुर रहता है, निशिदिन कोमल वेश। मधुर आमके वोरोंसे या बढ़ता जाता मिलने जो कोकिलकी कुहु कुहु सुन मदसे लगते खिलने ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें सखीने शृङ्गार रसके दोनों विभावोंका चित्रण किया है। इस मधुमासमें मलयाचलकी वायु हिमदेशकी ओर आ रही है। रातदिन मलयगिरिमें

प्रथमः सर्गः–सामोद-दामोदरः ७१ चन्दनके वृक्षोंपर जहरीले साँप अवस्थित रहते हैं। इसी कारण वह हवा हिमालयकी ओर प्रस्थान कर रही है। सर्पोंके दंशनके कारण मलयाचलमें सन्ताप उत्पन्न हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने उस सन्तापके कारण ही हवा हिमालयकी शीत हवाका आनन्द प्राप्त करनेके लिए हिमदेशको जा रही है। इस समय रसाल तरुवरोंमें मञ्जरियाँ भी उद्भूत हो जाती हैं। इन आमकी बौरोंको देखकर कोकिल समुदाय हर्षसे आह्लादित होकर उच्चस्वरसे कुहु-कुहुका स्वर आलाप करने लगा है। इस तरहकी उन्मादिनी प्रोन्मादिनी वेलामें श्रीकृष्णसे तुम्हारा डरना उचित नहीं है, राधे! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, अनुप्रास तथा उपमा अलंकार, वैदर्भी रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गारका सूचक रति नामक स्थायी भाव है॥२॥ उन्मीलनमधुगन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चूताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैरुद्गीर्णकर्णज्वराः। नीयन्ते पथिकैः कथंकथमपि ध्यानावधानक्षण- प्राप्त-प्राणसमा-समागम-रसोल्लासैरमी वासराः॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीय सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं चिरविरहिणः प्रियासङ्गं विना दिनयापनं दुर्घटमित्याह]–उन्मीलनमधु-गन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चुताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैः (उन्मीलत्सु प्रसरत्सु मधुगन्धेषु मकरन्दगन्धेषु लुब्धैः लोलुपैः मधुपैः भ्रमरैः व्याधूताः कम्पिताः ये चूतांकुराः आम्रमुकुलानि तेषु क्रीडतां कोकिलानां काकलीकलकलैः सूक्ष्ममधुरी-स्फुटध्वनिभिः) उद्गीर्णकर्णज्वराः (उद्गीर्णाः उद्भूताः कर्णज्वराः श्रोत्रपीडाः येषु तथोक्ताः)