गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६९ पटवासाः सुगन्धचूर्णविशेषाः तैः) काननानि वासयन् (सुरभीकुर्वन्) चेतः [वियोगिनामिति शेषः] दहति हि (नितरां सन्तापयत्येव) ॥१॥ अनुवाद—हे सखि! देखो, अर्द्ध प्रस्फुटित मल्लिकालताके मकरन्दके श्वेतचूर्णसे वनस्थली श्वेत पटवास द्वारा समाच्छादित हो गयी है। केतकी कुसुमोंके सुगन्धसे मलयपवन आमोदित हो रहा है, यह पवन कामदेवके बाणके समान उसका प्राणसखा बन विरहीजनोंके हृदयको दग्ध कर रहा है॥१॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीके सम्मुख वसन्तकालमें प्रवहमाना मलयवायुकी उद्दीपनाका वर्णन करती हुई कह रही है कि पवन विरहीजनोंके हृदयको तापित कर रहा है। यदि यह पूछा जाय कि किस अपराधके कारण वायु चित्तको दग्ध कर रही है तो इसके उत्तरमें कहते हैं, यह पवन कामदेवका प्राणतुल्य है, अतः अपने सखाके आदेशका पालन करते हुए विरहीजनोंके हृदयको तपाने लगता है। इस वसन्तकालमें मल्लिका-लता ईषत् रूपसे विकसित हो गयी है, उसके उड्डीयमान परागपुञ्ज ही पटवास बन गये हैं और केतकी प्रसूनोंके इस परिमल-चूर्णसे वायु सुगन्धसे परिपूर्ण हो गयी है, कामदेवके समान यह पवन भी विरहीजनोंको सन्तप्त कर रहा है। अतएव यह समीरण कामदेवके प्राणके समान है। प्रस्तुत श्लोक मालिनी छन्दका है, समासोक्ति तथा वर्णानुप्रास अलङ्कारोंकी संसृष्टि है॥१॥ अद्योत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशादिवेशाचलं प्रालेय-प्लवनेच्छयानुसरति श्रीखण्डशैलानिलः। किञ्च स्निग्ध-रसाल-मौलि-मुकुलान्यालोक्य हर्षोदया- दुन्मीलन्ति कुहूः कुहूरिति कलोत्तालाः पिकानां गिरः ॥२॥ अन्वय—अद्य (अधुना) श्रीखण्डशैलानिलः (श्रीखण्डशैलस्य मलयाचलस्य अनिलः वायुः) उत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशात् इव (उत्सङ्गे क्रोड़े वसन्तः ये भूजङ्गाः सर्पाः तेषां कवलेन