गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० श्रीगीतगोविन्दम् ग्रासेन यः क्लेशः तस्मात्); [भुजङ्गाः पवनाशनाः इति लोके प्रसिद्धमेव तस्य; भुजङ्गकवलेन विषव्याप्तदेहत्वादिति भावः] प्रालेय-प्लवनेच्छया (प्रालेयेषु हिमेषु प्लवनेच्छया अवगाहनाशया विषज्वालायाः शान्तये इति भावः) ईशाचलं (ईशस्य महादेवस्य अचलः पर्वतः हिमाचलस्तं) अनुसरति (गच्छति); [चन्दनतरु कोटरस्थ-विषधर-कवल-सन्तप्तोवायुः हिमस्नानेच्छया हिमाचलं यातीव; वसन्ते दक्षिणदिग्वर्त्तिनो मलयाचलात् वायेरुत्तरत्र गमनात् उत्तरे च हिमाचलस्य अवस्थानात् इयमुत्प्रेक्षा]। [किञ्च] स्निग्ध-रसाल-मौलिमुकुलानि (स्निग्धानि कोमलानि रसालानां चूततरूणां मौलिषु शिखरेषु यानि मुकुलानि तानि) आलोक्य (दृष्ट्वा) हर्षोदयात् (आनन्दोदयात्) पिकानां (कोकिलानां) कुहुः कुहूरिति कलोत्तालाः (कला अव्यक्तमधुरा उत्ताला अत्युच्चाः), गिरः (ध्वनयः) उन्मीलन्ति (उद्गच्छन्ति) ॥२॥ अनुवाद—अरी सखि! सुना है श्रीखण्डशैल (मलय पर्वत) में बहुतसे सर्प निवास करते हैं, वहाँका पवन भुजङ्गोंके विषसे निश्चित ही जर्जर हो गया है, इससे ऐसा लगता है कि वह उस विष ज्वालासे जलकर हिम सलिलमें स्नान करनेके लिए हिमालयकी ओर प्रवाहित होने लगा है। देखो! देखो! सखि! मधुर, मनोहर, स्निग्ध रसालमौलि मुकुलों (मञ्जरियों) को देखकर हर्षसे विभोर कोकिल कुहु-कुहुकी मधुर वाणीमें उच्चस्वरसे कूजन कर रही है। पद्यानुवाद— सतत सर्प पीड़ासे तापित, मलय पवन हिमदेश बहनेको आतुर रहता है, निशिदिन कोमल वेश। मधुर आमके वोरोंसे या बढ़ता जाता मिलने जो कोकिलकी कुहु कुहु सुन मदसे लगते खिलने ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें सखीने शृङ्गार रसके दोनों विभावोंका चित्रण किया है। इस मधुमासमें मलयाचलकी वायु हिमदेशकी ओर आ रही है। रातदिन मलयगिरिमें