गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः–सामोद-दामोदरः ७१ चन्दनके वृक्षोंपर जहरीले साँप अवस्थित रहते हैं। इसी कारण वह हवा हिमालयकी ओर प्रस्थान कर रही है। सर्पोंके दंशनके कारण मलयाचलमें सन्ताप उत्पन्न हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने उस सन्तापके कारण ही हवा हिमालयकी शीत हवाका आनन्द प्राप्त करनेके लिए हिमदेशको जा रही है। इस समय रसाल तरुवरोंमें मञ्जरियाँ भी उद्भूत हो जाती हैं। इन आमकी बौरोंको देखकर कोकिल समुदाय हर्षसे आह्लादित होकर उच्चस्वरसे कुहु-कुहुका स्वर आलाप करने लगा है। इस तरहकी उन्मादिनी प्रोन्मादिनी वेलामें श्रीकृष्णसे तुम्हारा डरना उचित नहीं है, राधे! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, अनुप्रास तथा उपमा अलंकार, वैदर्भी रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गारका सूचक रति नामक स्थायी भाव है॥२॥ उन्मीलनमधुगन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चूताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैरुद्गीर्णकर्णज्वराः। नीयन्ते पथिकैः कथंकथमपि ध्यानावधानक्षण- प्राप्त-प्राणसमा-समागम-रसोल्लासैरमी वासराः॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीय सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं चिरविरहिणः प्रियासङ्गं विना दिनयापनं दुर्घटमित्याह]–उन्मीलनमधु-गन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चुताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैः (उन्मीलत्सु प्रसरत्सु मधुगन्धेषु मकरन्दगन्धेषु लुब्धैः लोलुपैः मधुपैः भ्रमरैः व्याधूताः कम्पिताः ये चूतांकुराः आम्रमुकुलानि तेषु क्रीडतां कोकिलानां काकलीकलकलैः सूक्ष्ममधुरी-स्फुटध्वनिभिः) उद्गीर्णकर्णज्वराः (उद्गीर्णाः उद्भूताः कर्णज्वराः श्रोत्रपीडाः येषु तथोक्ताः)