गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ श्रीगीतगोविन्दम् ध्यानावधान-क्षणप्राप्तप्राणसमा-समागम-रसोल्लासैः (ध्यानं कान्तायाश्चिन्तनं तत्र यत् अवधानम् अभिनिवेशः तस्य क्षणे प्राप्तः अनुभूतः प्राणसमायाः प्रणयिन्याः समागमरसेन सङ्गसुखेन उल्लासः आनन्दः यैः तादृशैः सद्भिः) पथिकैः (विरहिभिः) अमी वासराः (वसन्तदिवसाः) कथंकथमपि (अतिकृच्छ्रेण) नीयन्ते (अतिबाह्यन्ते) ॥३॥ अनुवाद—हे सखि ! देखो ! उन्मीलित आम्र मुकुलके पुष्प किञ्जल्कके मधुगन्धके लुब्ध भ्रमरोंसे प्रकाशित मञ्जरियों पर कोयलें क्रीड़ा करती हुई कुहु-कुहु रवसे मधुर ध्वनि कर रही हैं और इस कोलाहलसे विरहीजनोंको कर्णज्वर हो रहा है। वसन्त ऋतुके वासरोंमें विरहीजन अतिशय कठोर विरह यातनाके कारण प्राणसम प्रेयसियोंका चिन्तन करने लगते हैं। तब उनके मुखमण्डलके ध्यानसे, उनके समागम जनित आनन्दके आविर्भूत हो जानेसे क्षणिक सुख लाभ करते हुए वे अति कष्टपूर्वक समयको अतिवाहित करते हैं॥३॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है कि विरहीजनोंका प्रिय विरह भी अति दुःसह होता है। श्रीकृष्ण-विरहमें मलय पवन ही केवल पीड़ाप्रद होता है, ऐसा नहीं, आम्रवृक्षमें बैठनेवाली कोयलोंकी कुहु-कुहु अति मधुर एवं अस्फुट ध्वनि चारों ओर गुञ्जन करने लगती है, जिसमें विरहीजनोंका हृदय अतिशय रूपसे अनुतप्त होता है। ये क्रीड़ापरायण कोयलें कलध्वनिसे कर्णज्वर प्रादुर्भूत कर रही हैं। जब कोयलका स्वर सुनकर विरही प्रियतमाका स्मरण करते हैं तो उन्हें लगता है कि प्राणसमा प्रियतमाका समागम हो गया है। यह समय अति कष्टपूर्वक अतिवाहित होता है। इस श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। इनमें काव्यलिङ्ग नामक अलङ्कार, गौड़ीया रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गार रस है। ‘वासराः’ पदमें बहुवचनका प्रयोग औचित्ययुक्त है॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीयः सन्दर्भः।