भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७३ चतुर्थः सन्दर्भः अनेक-नारी-परिरम्भ-सम्भ्रम- स्फुरन्मनोहारि-विलास-लालसम्। मुरारिमारादुपदर्शयन्त्यसौ सखीसमक्षं पुनराह राधिकाम् ॥१॥ अन्वय—[ततश्च तयोः श्रीकृष्णानुसन्धान-चेष्टा सफला सञ्जाता। श्रीकृष्णः तयोर्नेत्रपथवर्ती वभुव एवं समये] असौ (पूर्वोक्ता श्रीराधायाः सखी) आरात् (अनतिदूरे) [समवस्थितमिति शेषः] अनेकनारी-परिरम्भ-सम्भ्रम-स्फुरन्मनोहारि-विलासलालसम् (अनेकानां नारीणां गोपतरुणीनां परिरम्भे निर्भरालिङ्गने यः सम्भ्रमः आवेगः तेन स्फुरन् निरतिशयस्फूर्त्तिशाली अतएव मनोहारी चित्ताकर्षणकारी यः विलासः केलिः तत्र लालसा एकान्तौत्सुक्यं यस्य तादृशं) मुरारिं समक्षं (अक्ष्णोः समीपे) उपदर्शयन्ती (अङ्गुलीसङ्केतेन प्रदर्शयन्ती) पुनः राधिकाम् आह ॥१॥ अनुवाद—अनन्तर श्रीराधिकाजीकी सखीने बड़ी चतुरतासे श्रीकृष्णका अनुसन्धान कर लिया। सखीने देखा कि अति सान्निध्यमें ही श्रीकृष्ण गोप-युवतियोंके साथ प्रमोद विलासमें निमग्न आदरातिशयताको प्राप्त कर रहे हैं। उन रमणियोंके द्वारा आलिङ्गनकी उत्सुकता दिखाये जाने पर श्रीकृष्णके मनमें मनोज्ञ मनोहर विलासकी लालसा जाग उठी है। सखी अन्तरालसे (आड़में छिपकर) राधाजीको दिखलाती हुई पुनः यह बोली— पद्यानुवाद— परिरम्भ मदिर रस मातल प्रमदा परिवेशित हरिको। दिखला, राधासे आली बोली पी कर मधु छबिको॥