भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 448 में से

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७४ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—वनशोभाके चित्रण आदिके द्वारा कविने श्रीराधाजीके सुदीप्त भावको प्रकाशित किया है। कोई सखी श्रीराधाजीके समीप उपस्थित होकर श्रीकृष्णके अभिप्रायको साक्षात् रूपसे दिखलाती हुई कहती है (अनेक नारी इति श्लोकके द्वारा)—सखि देखो ! मुरारि इस समय क्या कर रहे हैं? वे इस समय इतनी तरुणियोंका आलिङ्गन प्राप्त करके भी तृप्त नहीं हो सके हैं, इसलिए अति मनोहारिणी श्रीराधाजीसे मिलनकी उत्सुकता प्रकट करने लगे हैं और विलासकी लालसासे उत्कण्ठित हो गये हैं। श्रीकृष्णका लीलाविलास नित्य है, इसलिए यह प्रत्यक्ष भी है। विरहमें स्मरण, स्फूर्ति तथा आविर्भाव—ये तीन वैशिष्ट्य परिलक्षित होते हैं। अतः यहाँ विलासका स्फुरित होना युक्तिसङ्गत है। इसमें वंशस्थविला छन्द, अनुप्रास अलङ्कार एवं दक्षिण नायक हैं॥१॥ गीतम् ॥४॥ रामकिरीरागेण यतितालेन च गीयते। चन्दन-चर्चित-नील-कलेवर पीतवसन-वनमाली केलिचलन्मणि-कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे विलासिनी विलसति केलिपरे ॥१॥ध्रुवम्॥ पीन-पयोधर-भार-भरेण हरिं परिरभ्य सरागं। गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चित-पञ्चम-रागम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥२॥]

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