भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६५ करुणा इसलिए कि कण्ठाश्लेष प्रणयीजनोंके वियोगमें इनकी बड़ी दीन दशा होती है और हास्यका कारण है, विरहीजनोंकी अधीरता। खिले केतकी पुष्पोंके अग्रभागको देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे विरहियोंके हृदयका विदारण करने हेतु बरछी हों। माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ। मुनि-मनसामपि मोहन-कारिणि तरुणाकारणबन्धौ- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥६॥ अन्वय-माधविका-परिमल-ललिते (माधविकायाः परिमलेन आमोदेन ललिते मनोहरे) [तथा] नवमालिकया (नवमालिका- कुसुमेन) अतिसुगन्धौ (अतिसुरभित) [अतएव] मुनि-मनसामपि (तापस-चित्तानामपि; का वार्त्ता कामिनाम् इत्यपेरर्थः) मोहन-कारिण (मोहकरे) [तथाच] तरुणाकारणवन्धौ (एकशेषस्तरुणशब्दः; तरुणानां तरुणीनाञ्चेत्यर्थः; अकारणवन्धौ अकृत्रिमसुहृदि; हेतुं विनापि हितकारिणीत्यर्थः) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥६॥ अनुवाद-यह वसन्त मास वासन्ती पुष्पोंके मकरन्दसे अतिशय ललित एवं मनोहर हो रहा है तथा नवमालिका (जूही) पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित हो रहा है। इसकालमें तो मुनियोंके मनमें भी विकार उत्पन्न हो जाता है, वे मुग्ध हो उठते हैं। यह वसन्त युवावर्गका अकारण बन्धु है॥ पद्यानुवाद- माधविका-मालती-गन्ध अब रही दिशामें व्याप। मोहित मुनि-मन विकल तरुण जन खिंचते अपने आप॥ दिखाये कैसे हियको चीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी-माधवी लताके पुष्पोंके परागसे यह वसन्त ऋतु मनोहर हो गया है और वातावरण नवमालिका (जूही) की सुगन्धसे सुवासित हो गया है। यह सुवासितता मुनिजनोंके