गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ श्रीगीतगोविन्दम् मनमें कामविकारको उत्पन्न करा देती है; फिर साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या की जाय? जब ऐसा वसन्त समय होता है, तब अचेतन लता कान्त (वृक्ष) के बिना नहीं रह सकती है, तो चेतनस्वरूपा हम जैसी स्त्री-लताएँ कान्तके बिना कैसे रह सकती हैं? उसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन, कोयलोंका कूजन और भी हृदयविदारक हो जाता है। ऐसी स्थितिमें वह वसन्त तरुण-तरुणियोंका अकारण बन्धु है॥६॥ स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित चूते। वृन्दावन-विपिने परिसर-परिगत-यमुनाजलपूते— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥७॥ अन्वय—स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित-चूते (स्फूरन्तीनां आकम्पितानाम् अतिमुक्तलतानां माधवीलतानां परिरम्भणेन आलिङ्गनेन पुलकिताः जातरोमाञ्चाः इव मुकुलिताः ईषद्विकसितमुकुलाः चूताः रसालाः यत्र तादृशे) [यथा कश्चित् वराङ्गनालिङ्गितः जातरोमाञ्चो भवति तथेति भावः]; [तथा] परिसर-परिगत-यमुना-जलपूते (परिसरेषु पर्यन्तभूमिषु प्रान्तेषु इत्यर्थः परिगता प्राप्ता या यमुना तस्याः जलैः पूते पवित्रीकृते सुशोभिते इति तात्पर्यार्थः) वृन्दावन-विपिने (वृन्दावन-कानने) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥७॥ अनुवाद—हे सखि! चपल मुक्तालताके आलिङ्गनसे युक्त मुकुलित (मञ्जरियोंसे पूर्ण) तथा रोमाञ्चित आम्रवृक्षोंसे युक्त वृन्दाविपिनके सन्निकट प्रवाहमाना यमुनाके पावन जलमें श्रीहरि युवतियोंके साथ परस्पर मिलित होकर विहार कर रहे हैं॥७॥ पद्यानुवाद— वायु चञ्चलित लता माधवीसे आलिङ्गित आम, परिपुष्पित है; पूत जमुन-जलसे वृन्दावन-धाम॥