भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६७ समाया उसमें सागर क्षीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—इस वासन्तिक कालमें चेतनके साथ जड़ पदार्थ भी कामसे विकृत देखे जा सकते हैं। समीरणके वश हुई अतिमुक्तालता (माधवीलता) ने जब आम्रवृक्षका आलिङ्गन किया तो वह मुकुलित और रोमाञ्चित हो गया। सन्निकटमें प्रवाहित होनेवाली यमुनाके जलसे पवित्र वृन्दाविपिनमें श्रीकृष्ण केलिक्रीड़ा कर रहे हैं ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमुदयतु हरिचरणस्मृतिसारं । सरस-वसन्त-समय वनवर्णनमनुगत मदन-विकारम्— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-भणितम् (जयदेवोक्तं) इदम् अनुगत- मदनविकारं (अनुगतं अनुसृतं मदनस्य कामस्य विकारो विक्रिया येन तत् कामादीपकमित्यर्थः) हरि-चरण-स्मृतिसारं (हरिचरणयोः स्मृतिः स्मरणमेव सारः परमार्थो यस्य तथाभूतं) सरस-वसन्तमय-वनवर्णनं (सरसः यः वसन्तसमयः तत्र वनवर्णनम्) उदयतु (भक्तहृदये वृद्धिं गच्छतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण-विरहजनित उत्कण्ठिता श्रीराधाके मदनविकारसे सम्बलित इस वसन्त समयकी वनशोभाका चित्रणरूप यह सरस मङ्गलगीत अति उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुआ है। यह वासन्तिक काल कामविकारोंसे अनुस्यूत है जो श्रीहरिके चरणकमलकी स्मृतिको उदित कराता है ॥८॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव काव्य केवल हरि-चरण-स्मृतिका सार, सरस वसन्त समय वन-वर्णन अनुगत मदन-विकार।