गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ श्रीगीतगोविन्दम् हास्यस्योपयुक्तत्वे श्लिष्टार्थस्य तरुणशब्दस्योपादानम्) [तथा] विरहि-निकृन्तन कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे (विरहिणां वियोगिनां निकृन्तनाः संहारकाः ये कुन्ताः अस्त्रविशेषाः तेषां मुखानामाकृतिरिव आकृति-येषां तादृशैः केतकिभिः तन्नामक-कुसुमविशेषैः (केयाफुल इति भाषा) दन्तुरिताः कृतदन्तविकाशाः परिव्याप्ता इति यावत् आशाः दिशः यत्र तादृशे) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अरी सखि ! वसन्तके प्रतापसे ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण जगत निर्लज्ज हो गया है। यह देखकर तरुण करुण पादपसमूह (वृक्षराजि) प्रफुल्लित सुमनोंके व्याजसे हँस रहे हैं। देखो, विरहीजनोंके हृदयको विदीर्ण करनेके लिए बरछीकी नोकके समान आकारवाले केतकी (केवड़ा) प्रसून चहुँदिशि प्रफुल्लित विलसित विकसित हो रहे हैं। इनके संयोगसे दिशाएँ भी प्रसन्न हो रही हैं। पद्यानुवाद— लज्जा गलित विश्वका करता तरुण करुण उपहास, बिद्ध केतकी कुन्तमुखोंसे विरही मन-आवास। हार जाते हैं पलमें वीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है—प्यारी सखि ! और क्या कहूँ, इस वसन्तकालमें जगतके विरहीजन लाजका त्यागकर प्रियतमके विरहमें रोदन कर रहे हैं। सम्पूर्ण जगतमें प्राणीमात्रकी ही लज्जा पूर्णरूपेण समाप्त हो गयी है। जगतकी इस दशाका अवलोकन करके तरुण करुण विटपावली खिले एवं द्युतिमान पुष्पोंके बहानेसे हास्यसुधा बिखेर रही हैं। अथवा विलासिनी स्त्रियोंके हृदयकी कामवासनाको जानकर नवतरुण पुरुष हास्यामृतको प्रकाशित कर रहा है। करुणा और हास्य दोनों किस प्रकार सम्भव है?