गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६१ पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं और इनपर श्रेणीबद्ध होकर असंख्य भ्रमर गुञ्जार कर रहे हैं और उधर श्रीकृष्ण युवतियोंके साथ विहार तथा नृत्य कर रहे हैं। हाय ! कैसे धैर्य धारण करूँ ॥२॥ पद्यानुवाद- काम-पीड़िता पांथ-वधू का व्यापित बहुल विलाप, अलिकुल संकुल सुमन मनोहर पादप बकुल कलाप। नहीं धरते हैं विरही धीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥२॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत श्लोकमें वसन्तकी दुरन्तता और उन्मादकताका चित्रण करते हुए सखी श्रीराधारानीसे कहती है कि यह समय विरहीजनोंके लिए अति दुष्कर है, इस समय मद तथा काम आविर्भूत हो जाते हैं। प्रियतमके द्वारा प्रवास हेतु चले जानेपर नानाप्रकारके मनोरथोंके द्वारा प्रचालित होकर नायिकाएँ विरह विलाप करती रहती हैं। चहुँदिशि मौलश्री आदि कुसुमसमूहके द्वारा सुगन्ध विकीर्ण करनेपर आमोदित भ्रमरकुल जैसे विकल होकर गुञ्जन करते हैं ॥२॥ मृगमद-सौरभ-रभसवशंवद नवदलमाल-तमाले। युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज-नखरुचि-किंशुकजाले- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥३॥ अन्वय-मृगमद-सौरभ-रभस-वशंवद-नव-दलमाल-तमाले (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः यः सौरभ-रभसः सौरभ-वेगः सौगन्ध्यातिशय इति यावत् तस्य वशंवदा वशवर्त्तिनी अनुकारिणीति भावः, नव-दल-माला किशलयसमूहः येषु तादृशः, तमालाः यस्मिन् तथा-भूते); [तथा] युवजन-हृदय-विदारण-मनसिज- नखरुचि-किंशुक-जाले (युवजनानां तरुणानां हृदय-विदारणाः हृदयभेदकराः मनसिजस्य मदनस्य ये नखाः तेषां रुचिः