भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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६० श्रीगीतगोविन्दम् कोयलोंका कूजन और भी हृदय विदारक हो जाता है। जब माधवी और बेली पुष्पोंके सौरभसे मुनियोंका मन भी आकर्षित हो जाता है, तब कामी-कामिनियोंकी तो बात ही क्या ? पुनः माधवकी स्फूर्ति प्राप्त होनेपर सखी कहती है—माधवी-लता जब आम्र वृक्षका आलिङ्गन करती है, तो मञ्जरियाँ पुलकित हो उठती हैं। जैसे किसी वर सुन्दरीके द्वारा किसी पुरुषको आलिङ्गन किये जानेसे वह पुलकित हो जाता है, वैसे ही आज श्रीहरि यमुना जलसे व्याप्त वृन्दाविपिनमें वसन्तकालकी शोभासे मुग्ध होकर युवतियों द्वारा आलिङ्गन परायण होकर विहार कर रहे हैं। इस श्लोकमें शृङ्गारके उद्दीपन विभागोंका वर्णन है। इन विभागोंसे विप्रलम्भ-शृङ्गारकी पुष्टि होती है ॥१॥ उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधूजन-जनित-विलापे । अलिकुल-संकुल-कुसुम-समूह-निराकुल-बकुल-कलापे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥२॥ अन्वय—उन्मद-मदन-मनोरथ-पथिक-वधूजन-जनित-विलापे (उद्गतो मदो यस्य तेन गर्वस्फीतेन मदनेन मनोरथो येषां तेषां पथिकवधूजनानां जनितो विलापो येन तस्मिन्) [तथा] अलिकुल-सङ्कुल-कुसुम-समूह-निराकुल-बकुल-कलापे (अलि- कुलेन भ्रमरनिकरेण सङ्कुलः आकीर्णो यः कुसुम-समूहः तेन निराकुलः नितरामाकुलः व्याप्तः इति यावत् वकुलकलापः यस्मिन् तादृशे) [सरस वसन्ते इत्यादि] ॥२॥ अनुवाद—प्रिय सखि ! प्रवासमें गये हुए पतियोंके विरहका अनुभवकर विरहिणियाँ केवल विलाप करती रहती हैं। तुम देखो तो ! इस वसन्त ऋतुमें मालती वृक्षोंमें पुष्पोंको समा लेनेके लिए कोई रिक्त स्थान ही नहीं है। राशि-राशि बकुल