भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ५९ सरसवसन्ते-सरस विशेषणके द्वारा वसन्त ऋतुकी रसमयता और आस्वाद्यता सूचित की गई है। विरहि जनस्य दुरन्ते-विरहीजन इस सरस वसन्तमें बड़े दुःखके साथ अपने समयको बिताते हैं। श्रीहरि अपने मधुर लीलाओंके द्वारा सबके चित्त, मन और प्राणोंका हरण कर लेते हैं और फिर उनका विरह अतिशय कष्टदायी और असहनीय होता है। ललित लवङ्गलता परिशीलन कोमल मलय समीरे-श्रीकृष्ण जहाँ विराजमान हैं, उस स्थानकी विशेषता बतलाते हुए कहते हैं कि मनोहर लवङ्गलताओंके संस्पर्शसे यहाँकी मलय वायु मृदुल बन गयी है, यों तो मलय समीर शीतल, मन्द और सुगन्धित होता है, किन्तु लवङ्ग-लताओंके संस्पर्शसे वह और भी कोमल और सुगन्धित बन गया है। मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज-कुटीरे-इस पदका विग्रह है-मधुकराणां यो हि निकर स्तेन करम्बिताः मिश्रिताः ये कोकिला स्तैः कूजितः यः कुञ्ज कुटीरः तत्र। अर्थात् नृत्य स्थान अमर समुदाय एवं कोकिला समूहसे कूजित कुञ्जकी कुटीर है। इस प्रकार किसी सहचरीके द्वारा विरह उत्कण्ठिता श्रीराधाके समीप वसन्तकालीन वृन्दावनकी शोभाका वर्णन किया गया है। मनोहर लवङ्ग-लताके द्वारा वृक्षका आलिङ्गन किये जानेसे, मलय पवनके संस्पर्शसे, पुष्पोंकी सुगन्धसे, यमुना जलकी शीतलतासे, लताओंकी कमनीयतासे, नारियोंके सुकोमल अङ्गके स्पर्शसे यह वसन्त, कान्तके मिलनमें जितना सुखदायी होता है, विरहमें उतना ही दुःखदायी भी होता है। जब वसन्त विलास होनेसे अचेतन लता भी कान्तके बिना नहीं रह सकती, तब चेतनस्वरूपा स्त्रीलता कान्तके बिना कैसे रह सकती है? इसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन,