गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ श्रीगीतगोविन्दम् कुञ्जकुटीरे (मधुकराणां भ्रमराणां निकरैः समूहैः करम्बिताः मिश्रिताः ये कोकिलाः तैः कूजितं मुखरितं कुञ्जकुटीरं यत्र तथाभूते); [तथा] विरहि-जनस्य दुरन्ते (निपीड़के) [सरसोऽपि वसन्तोऽयं विरहिणां दुःखदत्वात् दुरन्त इत्यर्थः]; इह सरस-वसन्ते (रसमये वसन्ते) [रसोऽत्र शृङ्गारः]; हरिः (मनोहरणशीलः अतोऽस्य विरहो दुःसहः) युवति-जनेन (कयाचित् तरुण्या) समं (सह) विहरति (क्रीडति) नृत्यति च॥१॥ अनुवाद—प्रिय सखि! राधे! हाय! यह वसन्तकाल विरही जनोंके लिए अतीव दुःखदायी है। देखो न! इसके आगमनपर मलय समीर सुकोमल मनोज्ञ लताओंको पुनः-पुनः आदरके साथ आलिङ्गनकर कैसी मनोहर शोभा प्रकट कर रहा है। देखो! कुञ्ज-कुटीरमें भ्रमरोंके मँडरानेसे उत्पन्न गुञ्जारसे तथा कोयलोंकी सुमधुर कुहुध्वनिसे दिग्दिगन्त परिपूरित हो गये हैं और वे श्रीकृष्ण इस कुञ्ज कुटीरमें किसी भाग्यवती युवतीके साथ विहार कर रहे हैं और प्रेमोत्सवमें मग्न होकर नृत्य भी कर रहे हैं। पद्यानुवाद— ललित लवङ्गलता परिचुम्बित कोमल मलय समीर मधुकर-निकर कलित कोकिलसे कुजित कुंज-कुटीर लहर उठता रमणीका चीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥१॥ बालबोधिनी—जब मलय समीरके सम्पर्कसे वृक्षावलियोंमें नवजीवनका सञ्चार होने लगता है, बेली, चमेली आदि पुष्पोंके खिलनेसे भौंरे गुञ्जार करने लगते हैं, आम्रके मुकुलित होनेसे कोयलें कूजन करने लगती हैं और वे कन्दर्प-मत्त-मातङ्गके समान मोरपंखकी पगड़ी धारणकर सबके मनको विमोहित करते हैं। वसन्तके समयमें वसन्त-राग होता है। यति-तालमें लघु और द्रुतकी त्रिपुटी रहती है। सखी-इस पदसे सुहृदत्व सूचित हो रहा है।