गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ श्रीगीतगोविन्दम् शोभाइव रुचिः शोभा येषां तथाभूतानां किंशुकानां पलाश-कुसुमानां जालं समूहः यस्मिन् तादृशे) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥३॥ अनुवाद—तमाल वृक्षावली नूतन पल्लवोंसे विभूषित हो मानो कस्तूरीकी भाँति चारों ओर सौरभका विस्तार कर आमोदित हो रही है। देखो, देखो सखी ! इन प्रफुल्लित ढाक (पलाश) के पुष्पोंकी कान्ति कामदेवके नखके समान दिखायी दे रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मदनराजाने मानो युवक युवतियोंके वक्षस्थलको विदीर्ण कर दिया है॥३॥ पद्यानुवाद— मृगमद-सौरभ सम विस्तारित परिमल मधुर तमाल; युवजन मन-बेधक मनसिज-कर नखरुचि किंशुक जाल। हृदयमें उठती रह रह पीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—समस्त दिशाओंमें तमाल वृक्षके नवीन पल्लव सुशोभित हो रहे हैं और उनकी सुगन्ध कस्तुरीके समान चतुर्दिशि व्याप्त हो रही है। प्रस्फुटित पलाश कुसुम- समूहको देखकर लगता है कि वे मानो विरही युवक युवतियोंके हृदयको विदीर्ण करनेके साधनभूत मदनदेवके नखरे-नख रूपी आयुध विशेष हैं। अर्थात् श्रीमाधवका अङ्गसौरभ चारों ओर आमोदित हो रहा है, परन्तु उनका विरह अति असहनीय हो गया है। उनके विरहमें युवतियोंका हृदय विदीर्ण हो गया है। यह बड़ा ही कठोर है। मदन-महीपति-कनक-दण्डरुचि-केशर-कुसुम-विकासे। मिलित-शिलीमुख-पाटल-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥४॥ अन्वय—मदन-महीपति-कनक-दण्ड-रुचि-केशर-कुसुम विकाशे (मदनमहीपतेः मदन-राजस्य यः कनकदण्डः स्वर्णमययष्टिः तस्य रुचिरिव रुचैर्यस्य तादृशः केसर-कुसुमानां