गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—हे देव! हे हरे! विषधर कालिय नामके नागका मद चूर्ण करनेवाले, निजजनोंको आह्लादित करनेवाले, हे यदुकुलरूप कमलके प्रभाकर! आपकी जय हो! जय हो॥३॥ पद्यानुवाद— कालिय विषधर गञ्जन जन रञ्जन हे। यदुकुल नलिन दिनेश जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—कवि श्रीकृष्णको अपना उपास्य होनेपर भी ध्येय विषयके रूपमें स्तुति कर रहे हैं। इसमें श्रीकृष्णका धीरोद्धत नायकत्व प्रस्तुत किया जा रहा है। कालिय विषधर गञ्जन—श्रीकृष्ण भगवान्ने यमुनामें रहनेवाले (कालिय दहमें) कालिय नामक सौ फणवाले महा विषधर सर्पका गर्व खर्व (चूर्ण) कर दिया। जन-रञ्जन ए—भगवान्ने कालिय दमनसे व्रजजनोंको आह्लादित किया। श्रीकृष्ण भलीभाँति जानते हैं कि व्रजजन उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते, यहाँतक कि वे मेरे बिना प्राण भी धारण नहीं कर सकते, उनकी रक्षा, उनका अनुरञ्जन श्रीकृष्णको भी करणीय हो जाता है। हे जन अनुरञ्जन कारिन्! आपकी जय हो!! यदुकुल-नलिन-दिनेश—गोपगण ही यादव हैं। अतएव भगवान् ही गोकुलके प्रकाशक हैं। जिस प्रकार भास्करके उदित हो जानेपर अरविन्द प्रफुल्लित हो जाता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्के द्वारा यदुवंशमें अवतार ग्रहण करनेसे यदुवंश विकसित हुआ है। प्रस्तुत पदमें श्रीभगवान्को बलशाली, जन-आह्लादकारी गुणसम्पन्न एवं कुलीन बताया है। अतः हे देव! आप हम जैसे मात्सर्य भावयुक्त अहङ्कारियोंका अहङ्कार चूर्णकर हमारा अनुरञ्जन करें। धीरोद्धत—मात्सर्यवान्, अहङ्कारी, मायावी, रोष-परायण, चञ्चल, विकथनकारी नायकको धीरोद्धत नायक कहा जाता है॥३॥