भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४३ मधु-मुर-नरक-विनाशन ! गरुड़ासन ! सुरकुल-केलि-निदान ! जय जय देव हरे ॥४॥ अन्वय—हे मधु-मुर-नरकविनाशन ! (मध्वादीनां विनाशकृत्) गरुड़ासन ! (गरुड़वाहन) सुरकुलकेलिनिदान ! (सुराणां कुलं तस्य केलिः स्वच्छन्दविहारः तस्य निदान कारण); [असुराणां निधनेन तेषामकुतोभयत्वादिति भावः]; [एतेन मायावित्वादि चतुष्टयमुक्तं भवति] हे देव, हरे, जय जय ॥४॥ अनुवाद—हे देव ! हे हरे ! हे मधुसूदन ! हे मुरारे ! हे नरकान्तकारी ! हे गरुड़-वाहन ! हे देवताओंके क्रीड़ा-विहार-निदान, आपकी जय हो ! जय हो ॥४॥ पद्यानुवाद— मधु-मुर नरक विनाशन, गरुड़ासन हे। सुरकुल केलि निदान, जय जय देव हरे ॥ बालबोधिनी—मधु-मुर-नरक विनाशन—श्रीकृष्णके तीन लोक हैं, जहाँ वे नित्य-लीलाविलास करते हैं। गोकुल, मथुरा एवं द्वारका। इन धामोंमें लीलाविलास करते हुए श्रीकृष्णमें नायकत्वके छियानवे लक्षण दिग्दर्शित हुए हैं। प्रस्तुत स्तवनांशमें उनका धीरोद्धत्तत्व प्रकाशित हो रहा है। श्रीकृष्णने द्वारकापुरीमें रहते हुए मधुदैत्य एवं नरकासुर आदिका संहार किया है। इस भावको मधु-मुर-नरक विनाशन पदसे अभिव्यक्त किया है। गरुड़ासन ए—गरुड़ आसनं यस्य तत्सम्बुद्धौ—यह गरुड़ासन पदका विग्रह है। पक्षिराज गरुड़का पृष्ठ भगवान्‌का आसन है। अतः भगवान्‌को गरुड़ासन अथवा गरुड़वाहन कहा जाता है। सुरकुल-केलिनिदान—असुरोंका संहारकर भगवान् देवताओंका आनन्दवर्द्धन किया करते हैं। वे भक्तजनोंके साथ आनन्द विहार करते हैं।