भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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४४ श्रीगीतगोविन्दम् यहाँ श्रीकृष्णका मायावित्व भी भासित हो रहा है। हे हरे ! आपकी जय हो ॥४॥ अमल-कमल-दललोचन ! भव मोचन ! त्रिभुवन भवन-निधान ! जय जय देव हरे ॥५॥ अन्वय—[सर्वतापोपशमनपूर्वकसर्वाभीष्टप्रदतया देवसहायक- रूपेण धीरोदात्तमाह]—हे अमलकमलदललोचन (प्रफुल्लपद्मपत्रे इवलोचने यस्य, हे तादृश) [एतेन तापशमकत्वम्]; हे भवमोचन (संसारक्लेशहर) [एतेन करुणत्वं]; हे त्रिभुवन- भवननिधान (त्रिभुवनमेव भवनं गृहं तस्य निधानं निधिरिव अमूल्यरत्नमित्यर्थः, तत्सम्बुद्धौ); [एतेन विनयित्वम्; हे देव, हरे, जय जय। [“गम्भीरो विनयी क्षन्ता करुणः सुदृढ़व्रतः। अकत्थनो गूढ़गर्वो धीरोदात्तः सुसत्त्वभृत् ॥”] ॥५॥ अनुवाद—हे देव! हे हरे ! हे निर्मल कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, भव-दुःख मोचन करनेवाले, त्रिभुवनरूप भवनके आधार स्वरूप, आपकी जय हो, जय हो ॥५॥ पद्यानुवाद— अमल कमल दल लोचन, भव-मोचन हे। त्रिभुवन भवन निधान, जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—पाँचवें पद्यमें श्रीकृष्णके धीरोदात्त गुणको अभिव्यक्त कर रहे हैं। अमल-कमल-दललोचन—अमले ये कमलदले ते इव लोचने यस्याऽसौ तथाविधः तत् सम्बुद्धौ अर्थात् जिनके नेत्र अमल कमल दलके समान निर्मल हैं। नेत्रयुगल सभीके तापोंका प्रशमनकर चित्त, मन और प्राणोंका हरण कर लेते हैं— तेरछे नेत्रान्त वाण विन्धे गोपीगण-प्राण। भवमोचन, सभी भक्तोंके संसार बन्धनका मोचन करते हैं, जीवोंकी रक्षा करते हैं। इस पदसे भगवान्‌का कारुण्य भी द्योतित हो रहा है।