भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४५ त्रिभुवन-भवन-निधान—श्रीहरि त्रैलोक्यव्यापक हैं, वे त्रैलोक्यरूपी भवनके निधिस्वरूप हैं, कारण हैं, जनक हैं—इस तरह आपमें विनयीत्व गुणका प्रकाश होता है। आपकी जय हो। धीरोदात्त—गम्भीर, विनयी, क्षमाशील, करुण, सुहृद्व्रती, अकथ्य कथनकारी, गुण गर्वीले तथा महान् सत्यपरायण आदि धीरोदात्तके गुण श्रीकृष्णमें विद्यमान हैं॥५॥ जनक-सुता-कृतभूषण ! जितदूषण ! समर-शमित-दशकण्ठ ! जय जय देव हरे ॥६॥ अन्वय—हे जनकसुताकृतभूषण (जनकसुतया सीतया कृतं भूषणम् अलङ्कारः यस्य; यद्वा जनक सुतायाः कृतं भूषणं येन तत्सम्बुद्धौ; हे सीताकृतालङ्कार; यद्वा कृतसीतालङ्कार), एतेन सुदृढ़व्रतत्वम्]; हे जितदूषण (जितः दूषणः दण्डकारण्यचरो राक्षसविशेषः येन अथवा जितं दूषणं दोषजननं कार्यं येन तत्सम्बुद्धौ; दूषणजयिन् अथच दोषरहित), [एतेन अकथनत्वम्]; [तथा] समरशमितदशकण्ठ (समरे युद्धे शमितः नाशितः दशकण्ठो रावणो येन तत्सम्बुद्धौ) [एतेन क्षन्तृत्वगूढ़गर्वत्वसुसत्त्व- भृत्त्वानि] हे देव, हरे, जय जय ॥६॥ अनुवाद—हे देव ! हे हरे ! श्रीरामावतारमें सीताजीको विभूषित करनेवाले, दूषण नामक राक्षसपर विजय प्राप्त करनेवाले तथा युद्धमें दशानन रावणको वधकर शान्त करनेवाले, आपकी जय हो ! जय हो ॥६॥ पद्यानुवाद— जनक-सुता कृत भूषण, जितदूषण हे। समर शमित दशकण्ठ, जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—भगवान् श्रीकृष्णके श्रीरामावतारमें धीरोदात्त नायकत्व है। जनक-सुता-कृतभूषण—धीरोदात्त गुणोंसे विभूषित हे देव!