भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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४६ श्रीगीतगोविन्दम् आप जनकसुताको अपने हाथोंसे समलंकृत करते हैं। आप नव दुर्वादलस्वरूप श्याम हैं। आपके द्वारा स्वर्णाङ्गी वैदेही विभूषित होती हैं। हे सुदृढ़ व्रतपरायण, आपकी जय हो। जितदूषण ए-जितदूषणो येनाऽसौ-आपने दूषण नामक राक्षसका वध कर दिया है। वनवासकालमें दण्डकारण्य नामक वनमें निवास करते हुए आप जितदूषण कहलाये। समर-शमित-दशकण्ठ-राक्षसराज रावण, जो संग्राममें स्थिर रहनेवाला संग्रामकारी और अकथ्य वचन बोलनेवाला, ऐसे महावीरको आपने रणप्राङ्गणमें धराशायीकर शान्त कर दिया। हे वीरोंके अधिपति ! हे हरे ! गूढ़गर्व तथा क्षमा गुणोंसे विभूषित आपकी जय हो ॥६॥ अभिनव-जलधर-सुन्दर ! धृतमन्दर ! श्रीमुखचन्द्रचकोर ! जय जय देव हरे ॥७॥ अन्वय—[अधुना धीरललितमुख्यत्वप्रतिपादनाय अजित- रूपत्वेन सम्पुटितमिव पुनस्तमेवाह]—हे अभिनव जलधर-सुन्दर (नवजलधररूचे) हे धृतमन्दर (मन्दरधारिन्) [आभ्यां नवतरुणत्वं तदधिगमः]; हे श्रीमुखचन्द्रचकोर (श्रियः लक्ष्म्याः मुखमेव चन्द्रः तत्र चकोरइव तत्सम्बुद्धौ; कमलावदनचन्द्रसुधापायिन् इत्यर्थः) [अनेन प्रेयसीवशत्वं सूचितम्] हे देव, हे हरे, त्वं जय जय ॥७॥ अनुवाद—हे नवीन जलधरके समान वर्णवाले श्यामसुन्दर ! हे मन्दराचलको धारण करनेवाले ! श्रीराधारूप महालक्ष्मीके मुखचन्द्रपर आसक्त रहनेवाले चकोर-स्वरूप ! हे हरे ! हे देव ! आपकी जय हो ! जय हो ॥७॥ पद्यानुवाद— अभिनव जलधर सुन्दर धृत मन्दर हे। श्रीमुख चन्द्र चकोर, जय जय देव हरे॥