गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४७ बालबोधिनी—प्रस्तुत पद्यमें धीरललित नायकका मुख्यत्व प्रतिपादन करते हुए भगवान्के विविध अवतारोंकी लीलाओंका प्रदर्शन किया है। अभिनव-जलधर-सुन्दर—श्रीभगवान् अभिनव सुन्दर हैं, उनका दिव्यातिदिव्य मङ्गलमय विग्रह सजल मेघके समान मनोहर है। धृतमन्दर—क्षीरसागरके मन्थन कालमें आपने मन्दराचलको धारण किया था। जब मन्दराचल ठहर नहीं रहा था, तब आप कच्छप बन गये थे अथवा श्रीराधाजीके हृदय देशको धारण करते हैं। दूसरे रूपमें देवताओंके साथ समुद्रका मन्थन करते हैं। श्रीमुखचन्द्र चकोर—श्रीराधाजीका मुखकमल भगवान्को आह्लादित करते रहनेके कारण विधु सरीखा है। चकोर जैसे चन्द्रमाकी ओर अस्पृह रूपमें निर्निमेष नेत्रोंसे देखा करता है, उसी प्रकार श्रीभगवान् भी श्रीराधाजीके मुखकी मनोज्ञताको देखकर हर्षातिरेकताका अनुभव करते रहते हैं। हे देव! हे हरे! आपकी जय हो!! नवजलधर सुन्दर पदसे भगवान्का नवतारुण्य द्योतित होता है। चकोर पदसे उनकी प्रेयसीवश्यता सूचित होती है। धृतमन्दर पदसे श्रीराधाजीके कुचयुगलको धारण करते हैं। हे प्रभो! आपकी जय हो॥७॥ तव चरणे प्रणता वयम् इति भावय। कुरु कुशलं प्रणतेषु, जय जय देव हरे ॥८॥ अन्वय—अथ श्रोतृषु वक्तृषुच प्रसादं प्रार्थयते—हे हरे! वयं तव चरणे प्रणताः इति भावय (चिन्तय—जानीहि); [ज्ञात्वाच] प्रणतेषु (अस्माषु) कुशलं कुरु (देहि); त्वल्लीला- नुभवसमर्थ कुरु। (त्वल्लीलानुभवस्य त्वत्प्रसादं विनानुपपत्तेः परमानन्दरूपत्वादित्यर्थः) हे देव, हरे जय जय॥८॥