भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ४१ अर्थात् यह आत्मा स्वभावसे कर्मके बन्धनसे रहित, जरा, मृत्यु, शोक, मोह, भूख, प्याससे रहित सत्यकाम तथा सत्यसङ्कल्प है। संसार बन्धनमें पड़े रहनेसे ये गुण तिरोहित हो जाते हैं और भगवान्‌की कृपा होनेपर आविर्भूत हो जाते हैं। इसलिए 'भवखण्डन' कहकर भगवान् श्रीकृष्णको सम्बोधित किया है। मुनिजनमानसहंस—मुनिजनानां मानसानि इव मानसानि तेषु हंस इव हंस-अर्थात् मननशील मुनियोंके मानसरूप मानसरोवरमें श्रीभगवान् उसी प्रकार विहार करते हैं, जैसे राजहंस मानसरोवरमें। आपके विहार करनेसे इन मुनियोंमें सदा स्फूर्ति होती रहती है। ये मुनिगण सम प्रकृति होकर कष्ट सहन करते हैं और विनय आदि गुणोंसे सम्पन्न होकर भजन करते हैं। भगवान्‌की कृपा होनेसे ये संसारसे विरक्त हो जाते हैं। देव-दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होनेके कारण भगवान्‌को 'देव' शब्दसे अभिहित किया है। जय-इस क्रियापदका प्रयोग कविकी आदरातिशयताका द्योतक है। प्रस्तुत पदके नायक धीरशान्त हैं ॥२॥ कालिय-विषधर-गञ्जन जनरञ्जन ! यदुकुल-नलिन-दिनेश ! जय जय देव हरे ॥३॥ अन्वय-[ध्येयविशेषत्वेन धीरोद्धतत्वमाह द्वाभ्याम्]—हे कालियविषधरगञ्जन (कालियसर्पदमन) हे जनरञ्जन (जनसन्तोष) हे यदुकुल-नलिन-दिनेश (यदुकुलान्येव नलिनानि तेषां दिनेशः सूर्यइव तत्सम्बुद्धौ) हे देव, हरे जय जय [“मात्सर्यवानहङ्कारी मायावी रोषणश्चलः। विकत्थनश्च विद्वद्भिर्धीरोद्धत उदाहृत।” अत्र कालियेत्यादिना मात्सर्यवत्त्वं जनरञ्जनेत्यादिना यदुकुलेत्यादिना च अहङ्कारित्वम् अहन्तया ममच जनरञ्जनादिसिद्धेः] ॥३॥