गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० श्रीगीतगोविन्दम् दिनमणि-मण्डल-मण्डन! भवखण्डन! मुनिजन-मानस-हंस! जय जय देव हरे॥२॥ अन्वय—[अथ सवितृमण्डलान्तर्ध्येयत्वेन धीरशान्तत्वमाह]—हे दिनमणिमण्डलमण्डन (हे सवितृमण्डलभूषण) [अनेन क्लेशसहत्वं विनयादिगुणोपेतत्वञ्च सूचितम्]; [अतएव] हे मुनिजनमानस-हंस (मुनिजनानां मानसं चित्तं तदाख्यः सरइव तत्र स्थित हंस) [हंसो जलचरजीवविशेषः तदाख्यपरममन्त्रस्वरूपश्च]; [अनेन समप्रकृतिकत्वं विनयादिगुणोपेतत्वञ्च सूचितम्]; हे भवखण्डन (भवं संसारं खण्डयतीति तत्सम्बुद्धौ, संसारबन्धखण्डनकृत्), हे देव, हरे, जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“सम प्रकृतिकक्लेश- सहनश्च विवेचकः। विनयादिगुणोपेतो धीरशान्त उदीर्यते”] ॥२॥ अनुवाद—हे देव! हे हरे! हे सूर्य-मण्डलको विभूषित करनेवाले, भव-बन्धनका छेदन करनेवाले! मुनिजनोंके मानस सरोवरमें विहार करनेवाले हंस! आपकी जय हो! जय हो॥२॥ पद्यानुवाद— दिनमणि मण्डित भव खण्डित हे। मुनिजन मानस हंस जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी—दिनमणि मण्डल मण्डन! श्रीभगवान्का सूर्यमण्डलके भीतर अन्तर्यामी रूपमें निवास है। वे ध्येय एवं चिन्तनीय हैं। ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती, नारायणः सरसिजासन सन्निविष्टः। जैसे सूर्यमण्डल सभीके द्वारा पूज्य हैं, उसी प्रकार आप भी सबके द्वारा चिन्तनीय एवं उपास्य हैं। और भी कहा है—ज्योतिरुभ्यन्तरे श्यामसुन्दरमतुलं॥ भवखण्डन ए—एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः।