भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३९ अर्थात् श्रीकृष्ण श्रीराधाजीके स्तनमण्डलीकी सेवा करनेवाले हैं। वे लक्ष्मीजीके प्रिय हैं तथा श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रियतमा हैं। इस पदसे यह भी सूचित होता है कि वे श्रीकृष्ण क्रीड़ाविलासी, विदग्ध, परिहास विशारद, प्रेयसीवश एवं निश्चिन्त हैं। 'ए'कार आलाप मात्र है। धृतकुण्डल ए, धृते कुण्डल येन स तथा तस्य सम्बुद्धिः, अर्थात् जिन्होंने कानोंमें कुण्डल धारण किया है, मकराकृति कुण्डल धारण करनेसे उनके मुखारविन्दकी शोभा और भी बढ़ जाती है। कलित ललित वनमाल—आपने अतिशय मनोहर वनमालाको धारण किया है। विश्वकोषकार कहते हैं— आपादलम्बिनी माला वनमालेति तां विदुः। पत्रपुष्पमयी माला वनमाला प्रकीर्त्तिता॥ अर्थात् पैरपर्यन्त लटकनेवाली मालाको वनमाला कहते हैं। वनमाला पत्र एवं पुष्पोंसे बनी हुई होती है। इस प्रकार तीनों विशेषणोंसे श्रीकृष्णका नवतारुण्य द्योतित होता है, उनका वेशविन्यास भी प्रकाशित होता है—नवकिशोर नटवर गोपवेश वेणुकर। हरे—हे श्रीकृष्ण ! आप सबके चित्त, मन एवं प्राणोंको आकर्षित करते हैं, साथ ही सबके मध्यमें अपनी लीला चमत्कारिता प्रकट करते हैं। इससे आपका उत्कर्ष उजागर हो रहा है। इस गीतिके प्रत्येक पदके अन्तमें 'जय जय देव हरे'—इस ध्रुव पदकी संयोजना है। प्रस्तुत श्लोकमें श्रीकृष्णका धीरललितत्व चित्रित हो रहा है, जैसाकि धीरललित नायकका लक्षण है—विदग्ध, नवतरुण, विशारद, निश्चिन्त एवं प्रेयसीवश्यता। 'ए'-कार का प्रयोग गानकी वेलामें रागपूर्त्तिके लिए हुआ है॥१॥