भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

३८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रितकमलाकुचमण्डल ! धृत कुण्डल ! कलित-ललित-वनमाल ! जय जय देव हरे ॥१॥ ध्रुवम् ॥ अन्वय-[इदानीं परव्योमनाथत्वेन धीरललितत्वमाह-हे श्रितकमलाकुचमण्डल (श्रितं धृतं कमलाया लक्ष्म्याः कुचमण्डलं स्तनयुगलं येन तत्सम्बुद्धौ) अनेन विदग्धत्वपरिहासविशारदत्व- प्रेयसीवशतत्वनिश्चिन्तत्वानि सुचितानि] हे धृतकुण्डल (धृते कुण्डले तत्सम्बुद्धौ) हे कलितललितवनमाल (कलिता धृता ललिता सुन्दरी वनमाला येन तत्सम्बुद्धौ); [एतेन विशेषणद्वयेन नवतारुण्यत्वं सूचितम्, तेनैव वेशविन्याससिद्धेः] हे देव, हरे, जय जय (उत्कर्षमाविष्कुरु) [“विदग्धो नव-तारुण्यः परिहास- विशारदः। निश्चिन्तो धीरललितः स्यात् प्रायः प्रेयसीवशः ॥”] ॥१॥ अनुवाद-हे श्रीराधाजीके स्तन मण्डलका आश्रय लेनेवाले ! कानोंमें कुण्डल तथा अतिशय मनोहर वनमाला धारण करनेवाले हे हरे ! आपकी जय हो ॥ अथवा हे देव ! हे हरे ! हे कमला कुचमण्डल बिहारी ! हे कुण्डल भूषण धारि ! हे ललित मालाधर ! आपकी जय हो ॥१॥ पद्यानुवाद- धृत कमला कुच मण्डल श्रुतिकुण्डल हे। कलित ललित वनमाल जय जय देव हरे॥ बालबोधिनी-कवि श्रीजयदेवजी श्रीकृष्णको सबके उपास्य रूपमें वर्णितकर अब दूसरे गीति-प्रबन्धमें एकमात्र चिन्तनीय स्वरूप ध्येयरूपमें वर्णन हेतु धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरशान्त और धीरललित आदि नायकत्व गुणोंसे समन्वित समस्त नायक-चूड़ामणि श्रीकृष्णकी सर्वश्रेष्ठताको प्रकटित करते हुए प्रार्थना करते हैं। श्रित कमला कुचमण्डल हे-इस पदका विग्रह है-श्रित कमलायाः कुचमण्डलं येनाऽसौ तत्सम्बुद्धौ श्रितकमलाकुचमण्डल