भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ५ श्रीराधामाधवकी कुञ्जगृहकी लीला जययुक्त हों। इस पदके द्वारा रतिजनित श्रमको दूर करने वाला शिशिर समीर सम्प्राप्ति युक्तत्वको सूचित किया गया है। यह कुञ्ज तमाल वृक्षोंके द्वारा सघन रूपसे आच्छादित होकर श्यामवर्ण हो गया है, इसको लक्ष्य करके पथका निर्देश किया गया है। 'नन्दनिदेशतः'—नन्द अर्थात् जो सबके आनन्दका विधान करते हैं। नन्दश्चासौ निदेशश्चेति—इस प्रकारसे यह नन्दमहाराजका निर्देश भी कहा जा सकता है। इस पदसे यह भी इङ्गित होता है कि जो सदासर्वदा आनन्दमें डूबे हुए हैं, उन नन्दनन्दनका निर्देश पाकर। यद्यपि 'नन्दनिदेशतः' पदके बहुत प्रकारके अर्थ बतलाये गये हैं, फिर भी उक्त पदका अभिप्राय "परम प्रेयसी श्रीराधा अपनी सखीके वचनोंको सुनकर" ही समुचित लगता है, क्योंकि महाराज नन्दका श्रीमती राधाको श्रीकृष्णके साथ कुञ्जमें विहार करनेके लिए आदेश देना कुछ अटपटा-सा रसाभास-सा प्रतीत होता है। वैसे ही स्वयं श्रीकृष्णका वैसा आदेश भी अटपटा ही प्रतीत होता है। यहाँ यही अभिप्रेत है कि सखीवचनका समादर करती हुई श्रीराधिका कृष्णको साथ लेकर चलने लगीं। सखीवचन—हे राधे ! यह कृष्ण भीरु स्वभावयुक्त हैं क्योंकि पिछली रात तुम्हें छोड़कर दूसरी नायिकाके साथ मिलित हुए थे, अपने इस अपराधके कारण तुमसे डरे हुए हैं, उनका भयभीत होना स्वाभाविक ही है। तुम्हारे द्वारा लगाया गया अपराध 'बहु नायिका-वल्लभ' ठीक ही है, अब तुम ही मर्मपीडित श्रीकृष्णको अपनेमें प्राप्त कराओ। 'गृहं प्रापय'—हे राधे ! श्रीकृष्णको लेकर गृहं प्रापय अर्थात् मञ्जु वृक्षोंसे सुशोभित केलि सदनमें प्रवेश करो, क्योंकि यही तुम्हारे लिए अनुकूल है। अथवा घरमें ले जाओ अर्थात् कुञ्जगृहमें प्रवेश कराकर गृहस्थ अर्थात्

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