भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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४ श्रीगीतगोविन्दम् परम प्रेयसी श्रीराधा अपनी सखीके वचनोंका स्मरण कर श्रीकृष्णको साथ लेकर कुञ्जमें प्रवेश कर जो सुखक्रीड़ाएँ करती हैं, उन्हींको मङ्गलाचरणके रूपमें प्रस्तुत किया गया है। ग्रन्थका प्रतिपाद्य-तत्त्व श्रीराधामाधवकी लीलामाधुरी है; अतः यह प्रबन्ध सभीके लिए मङ्गलदायी और कल्याणकारी है। ‘मेघैर्मेदुरमम्बरम्’ इस श्लोकमें कह रहे हैं कि श्रीराधामाधवकी सर्वोत्कृष्ट रहःकेलि जययुक्त हो। ‘माधव’ पदके द्वारा इस कार्यकी सूचना दी गई है कि यद्यपि श्रीभगवान् लक्ष्मीपति हैं फिर भी उनका श्रीराधामें ही प्रेमाधिक्य है। श्रीकृष्ण स्वयं-भगवान् हैं, सर्व-अवतारी हैं; सभी अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं; श्रीमद्भागवतमें श्रीसूतजीने ऐसा ही निर्णय किया है। श्रीबृहद्गौतमीय तन्त्रमें कहा गया है— “देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वस्यान्तःसंमोहिनी परा।” श्रीमती राधिका द्योतमाना, परमा सुन्दरी हैं। ये कृष्णक्रीड़ाकी वसति नगरी अर्थात् आश्रय स्वरूपा हैं। कृष्णमयी—कृष्ण इनके भीतर-बाहर अवस्थित रहते हैं। निरन्तर कृष्णकी अभिलाषा पूर्ण करती हैं; समस्त देवताओंमें सर्वश्रेष्ठा हैं; समस्त लक्ष्मियोंमें परम लक्ष्मी-स्वरूपा हैं। सभीकी हृदय-स्वरूपा हैं, श्रीकृष्ण-चित्ताकर्षका हैं, परा हैं। ये श्रीश्रीराधामाधव इस काव्य-रचनाकी निर्विघ्न परिसमाप्तिके लिए अनुग्रह प्रदान करें—इस प्रकार कविके द्वारा शिष्टाचार परम्पराका निर्वाह किया गया है। जय शब्दसे तात्पर्य है—लीलाओंका सर्वोत्कृष्ट और भक्तजनोंके द्वारा नमस्करणीय होना। ये लीलाएँ भगवान्‌की स्वरूपशक्तिकी वृत्तिरूपा हैं, अतः ये जययुक्त हों। अब प्रश्न होता है कि कौन-सी लीलाएँ जययुक्त हों ? इसके उत्तरमें कहा है—यमुनाकूले—यमुनाके तटपर अवस्थित