गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३ जयन्ति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तन्ते)। [श्रीकृष्णस्य स्वयं भगवत्त्वेन सर्वावतारेभ्यः, श्रीराधायाश्च सर्वलक्ष्मीमयत्वेनास्य सर्वप्रेयसीभ्यः श्रेष्ठ्यात् इतिभावः; तथाचोक्तं सूतेन “एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” इति।] वृहद्-गोतमीये च-“देवी कृष्णामयी प्रोक्ता राधिका परदेवता सर्वलक्ष्मीमयी सर्वस्यान्तः- संमोहिनी परा” इति ॥१॥ अनुवाद—हे राधे! समस्त दिशाएँ घनघोर घटाओंसे आच्छादित हो गई हैं। वन वसुन्धरा श्यामल तमाल विटपावलीकी प्रतिच्छायासे तिमिरयुक्ता हो गई है। भीरु स्वभाववाले कृष्ण इस निशीथमें एकाकी नहीं जा सकेंगे—अतः तुम इन्हें अपने साथ ही लेकर सदनमें पहुँचो। श्रीराधाजी, सखी द्वारा उच्चरित इस वचनका समादर करती हुई आनन्दातिशयतासे विमुग्ध हो, पथके पार्श्वमें स्थित कुञ्ज- तरुवरोंकी ओर अभिमुख हुई और कालिन्दीके किनारे उपस्थित होकर एकान्तमें केलि करने लगीं। श्रीयुगल माधुरीकी यह रहस्यमयी लीला भक्तोंके हृदयमें स्फुरित होकर विजयी हो। पद्यानुवाद— मेघ भरित अम्बर अति श्यामल तरु तमालकी छाया, कान्ह भीरु ले जा राधे! गृह, व्याप्त रातकी माया। पा निर्देश यह नन्द महरका हरि-राधा मदमाते, यमुन-पुलिनके कुञ्ज-कुञ्जमें क्रीड़ा करते जाते ॥१॥ बालबोधिनी—गीतगोविन्द नामक इस प्रबन्धमें श्रीराधा- माधवकी ऐकान्तिकी प्रेममयी निकुञ्ज लीलाका चित्रण किया गया है। रचनाकार महाकवि श्रीजयदेव गोस्वामीने श्रीराधामाधवकी स्मरकेलि-लीलाका वर्णन कर उन दोनोंकी सर्वश्रेष्ठता स्थापित की है। ग्रन्थकृतिके प्रारम्भमें श्रीकविराजजीने तमालवृक्षके तमःपुञ्ज द्वारा समाच्छादित कुञ्ज-भवनमें श्रीराधा-माधवकी प्रविष्टिका चित्रण किया है।