भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रस्तावना [झ] प्रकटित हुआ है। यही अखिल श्रुतियोंका सार स्वरूप है। श्रुतियोंने कहा है कि वे परमात्मा जिसको चाहते हैं वही उनको प्राप्त होते हैं- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ (कठ १/२/२३) भगवान् श्रीकृष्ण आनन्दघनमूर्त्ति हैं। जीव भी सब समय केवल आनन्दका ही अनुसन्धान कर रहा है, उसे प्राप्त नहीं कर पा रहा है। किन्तु जिस दिन जीवोंका ऐसा सौभाग्य उदित होगा, उसी दिन अर्थात् जिस समय भक्तोंके अन्तर्निहित भावोंको देखकर भगवान् स्वयं अपनेको ज्ञात करा देंगे, उसी दिन अपने सौभाग्यके बलसे स्वयं आनन्द भी उनका अनुसन्धान करेगा। साधक भक्त अपने हृदयमें कृष्णाकर्षणी प्रेमभक्ति संचयकर अपने घरमें बैठा रहेगा और प्रेमलोलुप आनन्दमय श्रीकृष्ण उसके निकट जानेके लिए परम व्याकुल हो उठेंगे। अपराधीकी भाँति अनुनय विनय करेंगे-देहि पदपल्लवमुदारं। यही निखिल श्रुतियोंका सार स्वरूप है। श्रुतियाँ कहती हैं-ब्रह्म जितना निकट है उतना दूर भी है। श्रीगीतगोविन्दके काव्य-तत्त्वकी आलोचना श्रीजयदेव कविने इस मधुर-काव्यमें गान्धर्व-विद्याका कौशल, ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके चिन्तन-स्मरणका समस्त रहस्य, सम्भोग और विप्रलम्भ दोनों प्रकारके शृंगाररसका विस्तृत विवेचन तथा काव्य-प्रणयकी प्राचीन पद्धति, सभीका मणिकाञ्चन न्यायसे सन्निवेश किया है। उन्होंने स्वयं कहा है—'सानन्दाः परिशोधयन्तु सुधियः श्रीगीतगोविन्दतः' (१२/२४/११) इस चतुर्थ चरणका यह भी अभिप्राय है कि इन समस्त