गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—अयि विलासिनि (विलासवति) केलि-चलन्मणि- कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली (केलिना क्रीडारसेन चलन्ती ये मणिकुण्डले रत्नमय-कर्णभूषणे ताभ्यां मण्डितं शोभितं गण्डयुगं कपोलयुगलं यस्य सः; तथा स्मितेन मृदुहासेन शालते शोभते इति स्मितशाली, स चासौ स चेति तथा) चन्दन-चर्चित-नीलकलेवर-पीतवसन-वनमाली (चन्दनैः चर्चितम् अनुलिप्तं नीलं कलेवरं यस्य सः; तथा पीत वसनं यस्य तथोक्तः; तथा वनमाली वनकुसुम-मालाधरः; स चासौ स चासौ स चासौ स चेति तथा) हरिः इह (अस्मिन्) केलिपरे (क्रीडासक्ते) मुग्धवधूनिकरे (सुन्दरी-समूहे) विलसति (विहरति) [अहो श्रीकृष्णस्य अकृत-वेदित्वम् ! त्वद्दत्त-चन्दन-वनमाला-भूषित स्त्वद्वर्णवसनावृताङ्गयष्टिरेव विलसतीत्यवलोकय] ॥१॥ अनुवाद—हे विलासिनी श्रीराधे! देखो! पीतवसन धारण किये हुए, अपने तमाल-श्यामल-अङ्गोंमें चन्दनका विलेपन करते हुए, केलिविलासपरायण श्रीकृष्ण इस वृन्दाविपिनमें मुग्ध वधुटियोंके साथ परम आमोदित होकर विहार कर रहे हैं, जिसके कारण दोनों कानोंमें कुण्डल दोलायमान हो रहे हैं, उनके कपोलद्वयकी शोभा अति अद्भुत है। मधुमय हासविलासके द्वारा मुखमण्डल अद्भुत माधुर्यको प्रकट कर रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— चन्दन चर्चित नील कलेवर पीत वसन वनमाली केलि चञ्चला मणि कुण्डल गति स्मितमुख शोभाशाली। काम मोहिता, रूप गर्विता, गोपीजन कर साधे विलस रहे हैं श्रीहरि आतुर, निरखि विलासिनि राधे ॥ बालबोधिनी—इस गीतका राग रामकरी तथा झम्पा ताल है। रस-मञ्जरीकारने यहाँ रूपक ताल माना है। जब कान्ता नीलवसन धारणकर प्रभातकालीन आकाशकी भाँति स्वर्णिम आभूषण पहनकर अपने कान्तके प्रति उन्नत