भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७७ प्रकारका मान कर बैठती है, तब वह कान्त उनके चरणोंके समीप स्थित होकर मनाने लगते हैं, उस समयावस्थाका वर्णन रामकरी रागमें होता है। जहाँ श्रीराधाजी अपनी सखीके साथ विद्यमान हैं, उनसे थोड़ी ही दूर श्रीकृष्ण केलिपरायण तथा विलासयुक्त नायिकाओंके समूहमें विलासविहार कर रहे हैं, जिसे देखकर राधाजीके मनमें भी श्रीकृष्णके साथ रमण करनेकी लालसा जाग उठती है। श्रीकृष्ण निकुञ्जवनमें किसी व्रजसुन्दरीको आलिङ्गन करते हैं तो कृष्णके हृदयमें राधाजीकी स्फूर्त्ति होने लगती है॥१॥ मुग्ध—मुग्ध शब्द मुग्धा नायिकाके भेद तथा सुन्दर दोनोंका वाचक है। मुग्धके ये दोनों ही अर्थ यहाँ अभिप्रेत हैं। विलास—एक हावभावविशेषका नाम है। नाट्यशास्त्रमें भरतमुनिने कहा है— स्थाने यानासने वापि नेत्र वक्त्रादि कर्मणा। उत्पाद्यते विशेषो यः स विलासः प्रकीर्त्तितः॥ अर्थात् चलते, बैठते तथा यात्रा करनेके समय नेत्र एवं मुख आदिकी क्रिया और भङ्गीके द्वारा जो मनोहर चेष्टा होती है, वही विलास शब्दसे अभिहित है। स्मित—श्रीकृष्ण मुस्करा रहे हैं। ईषत् हासको स्मित कहते हैं। भरत मुनिके शब्दोंमें— ईषद् विकसितैर्गण्डैः कटाक्षैः सौष्ठवान्वितैः। अलक्षितद्विजं धीरमुत्तमानां स्मितं भवेत्॥ अर्थात् जो व्यक्ति मुस्कराता है, उसके दाँत दिखलायी नहीं पड़ते हैं। स्मितमें मनोहर कटाक्षके द्वारा कपोल थोड़े विकसित अवश्य हो जाते हैं। पीन-पयोधर-भार-भरेण हरिं परिरभ्य सरागं। गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चित-पञ्चम-रागम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥२॥]