गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—सखि, काचित् गोपवधूः पीनपयोधर-भार-भरेण (पीनयोः विशालयोः पयोधरयोः स्तनयोः भारभरेण भारातिशयेन; निविड़-स्तनभारातिशयेन इत्यर्थः) सरागं [यथास्यात् तथा] हरिं परिरभ्य (निर्भरमालिङ्ग्य) उदञ्चितपञ्चमरागं (उदञ्चित उद्घोषित उच्चैर्गीत इति यावत् पञ्चमरागो यस्मिन् तद् यथा तथा) अनु (पश्चात् परिरम्भणानन्तरमित्यर्थः) गायति। हरिरिहेत्यादि सर्वत्र योज्यम् ॥२॥ अनुवाद—देखो सखि ! वह एक गोपाङ्गना अपने पीनतर पयोधर-युगलके विपुल भारको श्रीकृष्णके वक्षस्थलपर सन्निविष्टकर प्रगाढ़ अनुरागके साथ सुदृढ़रूपसे आलिङ्गन करती हुई उनके साथ पञ्चम स्वरमें गाने लगती है। पद्यानुवाद— कोई पीन पयोधर गोपी युग भुजमें बँध जाती हरि गायनके अन्त साथ उठ पञ्चम स्वरमें गाती ॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे गोपियोंकी श्रीकृष्णके साथ की जानेवाली चेष्टाओंका वर्णन करती हुई कहती है—हे राधे, तुम्हारे साथ श्रीकृष्णका जो विलास है, वह असमोर्द्ध है। विपुल स्तनवाली गौरवातिशय युक्ता गोपीके द्वारा अतिशय अनुरागके साथ श्रीकृष्णका आलिङ्गन किया जाना तो एक आभास मात्र है। भला ये सुन्दरियाँ तुम्हारी समानता कहाँ कर सकती हैं। आगे-आगे श्रीहरि पञ्चम रागमें गा रहे हैं और गोपी उनके गानेके बाद उसी प्रकारसे गा रही है। गोपीको पीन पयोधरवती बताना उसकी सौन्दर्यातिशयताको सूचित करना है। इसमें श्रीकृष्णकी अनिपुणता भी प्रदर्शित हो रही है। अतएव उनके द्वारा आलिङ्गनका प्रयास किये बिना ही गोपी उनका आलिङ्गन कर रही है। अतः यह केलि रहस्य मधुर होनेपर भी श्रीराधाजीके अभावमें कैसे श्रेष्ठ हो सकता है?